या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
yā devī sarvabhūteṣu śakti-rūpeṇa saṃsthitā । namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ ॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण का अर्थ
जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति रूप में विद्यमान हैं, उन्हें बारंबार नमस्कार है।
शब्दार्थ
- याyā
जो; वह देवी जो
- देवीdevī
देवी
- सर्वभूतेषुsarvabhūteṣu
सभी प्राणियों में
सर्व और भूत से बना पद; अधिकरण बहुवचन।
- शक्ति-रूपेणśakti-rūpeṇa
शक्ति के रूप में
- संस्थिताsaṃsthitā
विद्यमान; स्थित
- नमस्तस्यैnamastasyai
उन देवी को नमस्कार
नमः + तस्यै की सन्धि; तस्यै का अर्थ है उन देवी को।
- नमस्तस्यैnamastasyai
उन देवी को नमस्कार
नमः + तस्यै की सन्धि; तस्यै का अर्थ है उन देवी को।
- नमस्तस्यैnamastasyai
उन देवी को नमस्कार
नमः + तस्यै की सन्धि; तस्यै का अर्थ है उन देवी को।
- नमोnamo
नमस्कार
अगले नमः से पहले नमः का सन्धिरूप।
- नमःnamaḥ
नमस्कार
व्याख्या
यह प्रार्थना प्रत्येक प्राणी में उपस्थित शक्ति को देवी का स्वरूप मानकर प्रणाम करती है। 'सर्वभूतेषु' का अर्थ सभी प्राणियों में है और 'शक्ति-रूपेण' बताता है कि देवी उनमें शक्ति बनकर विद्यमान हैं। 'संस्थिता' उनके स्थिर वास का बोध कराता है, जिससे उपासक जीवों के भीतर भी दिव्य उपस्थिति को पहचानता है। तीन बार 'नमस्तस्यै' और फिर 'नमो नमः' की आवृत्ति प्रार्थना में गहरी भक्ति और बारंबार नमन का भाव लाती है। दैनिक जीवन में यह भाव अपनी कार्यक्षमता के प्रति कृतज्ञता और दूसरों में मौजूद सामर्थ्य के प्रति आदर की प्रेरणा दे सकता है।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
देवी महात्म्यम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंयैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते। ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥
yaistu bhaktyā smṛtā nūnaṃ teṣāṃ vṛddhiḥ prajāyate । ye tvāṃ smaranti deveśi rakṣase tānna saṃśayaḥ ॥
देवी कवचम् की यह प्रार्थना भक्तिपूर्वक देवी का स्मरण करने वालों की वृद्धि और रक्षा का आश्वासन देती है।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
sarvamaṅgalamāṅgalye śive sarvārthasādhike । śaraṇye tryambake gauri nārāyaṇi namo’stu te ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना शरण देने वाली और समस्त उद्देश्यों को सिद्ध करने वाली मंगलमयी नारायणी को नमन करती है।
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया। सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥
tvaṃ vaiṣṇavī śaktiranantavīryā viśvasya bījaṃ paramāsi māyā । sammohitaṃ devi samastametat tvaṃ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ ॥
देवी महात्म्यम् का यह श्लोक देवी को विश्व का मूल कारण और अपनी कृपा से मुक्ति देने वाली शक्ति के रूप में स्तुति करता है।
शक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंखद्योतो द्योतते तावद् यावन्नोदयते शशी। उदिते तु सहस्रांशौ न खद्योतो न चन्द्रमाः॥
khadyoto dyotate tāvad yāvannodayate śaśī। udite tu sahasrāṃśau na khadyoto na candramāḥ॥
जुगनू चन्द्रमा के उदय तक चमकता है; सूर्य के उदय पर दोनों का प्रकाश फीका पड़ जाता है। श्लोक अधिक तेज के सामने छोटे प्रकाश की स्थिति दिखाता है।
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते। ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥
yaistu bhaktyā smṛtā nūnaṃ teṣāṃ vṛddhiḥ prajāyate । ye tvāṃ smaranti deveśi rakṣase tānna saṃśayaḥ ॥
देवी कवचम् की यह प्रार्थना भक्तिपूर्वक देवी का स्मरण करने वालों की वृद्धि और रक्षा का आश्वासन देती है।
तव च का किल न स्तुतिरम्बिके! सकलशब्दमयी किल ते तनुः। निखिलमूर्तिषु मे भवदन्वयो मनसिजासु बहिःप्रसरासु च॥
tava ca kā kila na stutirambike! sakalaśabdamayī kila te tanuḥ । nikhilamūrtiṣu me bhavadanvayo manasijāsu bahiḥprasarāsu ca ॥
अम्बिका की यह स्तुति समस्त शब्दों, मन में उठने वाले रूपों और बाहरी जगत में देवी की व्याप्ति देखती है।