त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया। सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥
tvaṃ vaiṣṇavī śaktiranantavīryā viśvasya bījaṃ paramāsi māyā । sammohitaṃ devi samastametat tvaṃ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ ॥
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य का अर्थ
हे देवी! आप वैष्णवी शक्ति हैं, अनन्त पराक्रम से युक्त आप ही इस सम्पूर्ण विश्व का मूल कारण हैं। यह सम्पूर्ण जगत् आपके द्वारा ही नियंत्रित है और जब आप प्रसन्न होती हैं, तब पृथ्वी पर सभी प्राणियों के लिए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती हैं।
शब्दार्थ
- त्वंtvaṃ
आप
- वैष्णवीvaiṣṇavī
विष्णु की; विष्णु से सम्बद्ध शक्ति
- शक्तिरनन्तवीर्याśaktiranantavīryā
अनन्त पराक्रम वाली शक्ति; शक्तिः + अनन्तवीर्या
- विश्वस्यviśvasya
विश्व का
- बीजंbījaṃ
बीज, मूल कारण
- परमासिparamāsi
आप परम हैं; परमा + असि
- मायाmāyā
माया, जगत् की अभिव्यक्ति और मोह की दिव्य शक्ति
- सम्मोहितंsammohitaṃ
मोह में पड़ा हुआ
- देविdevi
हे देवी
- समस्तमेतत्samastametat
यह सब; समस्तम् + एतत्
- त्वंtvaṃ
आप
- वैvai
निश्चय ही; बल देने वाला अव्यय
- प्रसन्नाprasannā
प्रसन्न, कृपालु
- भुविbhuvi
पृथ्वी पर, इस जगत् में
- मुक्तिहेतुःmuktihetuḥ
मुक्ति का कारण; मुक्ति + हेतुः
व्याख्या
इस श्लोक में देवी को वैष्णवी शक्ति कहा गया है, अर्थात् विष्णु से सम्बद्ध वह शक्ति जिसका पराक्रम अनन्त है। बीज की उपमा उन्हें विश्व का मूल कारण बताती है, जबकि परमा माया उनके उस सर्वोच्च स्वरूप को व्यक्त करती है जिससे जगत् की अभिव्यक्ति और मोह जुड़े हैं। सम्मोहितं का सीधा अर्थ मोह में पड़ा हुआ है, इसलिए संस्कृत में पूरे जगत् के मोहित होने का भाव है, जिसे दिए गए अर्थ में देवी के नियंत्रण के रूप में समझाया गया है। अंतिम पद मुक्तिहेतुः देवी को प्रसन्न होने पर मुक्ति का कारण बताते हैं, जिससे वही दिव्य शक्ति संसार के मोह और उससे छुटकारे, दोनों से जुड़ती है। आज का भक्त इसे अपनी समझ की सीमाएँ स्वीकार करने और उनसे आगे ले जाने वाली कृपा माँगने की प्रार्थना के रूप में पढ़ सकता है।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
देवी महात्म्यम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatam idaṁ jagad ātmaśaktyā niśśeṣa-devagaṇa-śakti-samūha-mūrtyā । tām ambikām akhila-deva-maharṣi-pūjyāṁ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्य का यह मंत्र उस जगदम्बा को नमन करता है जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं और समस्त शक्तियों के एकीकृत सामर्थ्य का साक्षात् स्वरूप हैं।
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।