वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं का अर्थ
सच्चे शूरवीर साहस, पराक्रम और उदारता से युक्त होते हैं। जो उनके प्रति विनम्रता और आदर रखते हैं, उनके प्रति वे स्नेह और सम्मान रखते हैं। वे सौहार्दपूर्ण व्यवहार को महत्त्व देते हैं, क्योंकि विनम्रतापूर्वक आदर करने वाले उन्हें प्रिय होते हैं।
शब्दार्थ
- वत्सराजोऽपिvatsarājo 'pi
वत्सराज भी
वत्सराजः + अपि; अपि का अर्थ भी है।
- तंtaṃ
उस
- प्राप्तंprāptaṃ
जो आया था
- प्रदत्तोपायनंpradattopāyanaṃ
जिसने भेंट अर्पित की थी
प्रदत्त + उपायन, जिसने उपहार दे दिए हों।
- नृपम्nṛpam
राजा को
- प्रीत्याprītyā
स्नेहपूर्वक
- सम्मानयामासsammānayāmāsa
सम्मान दिया
सम्मान करने की पूर्ण हो चुकी क्रिया को व्यक्त करने वाला लिट् रूप।
- शूराśūrā
शूरवीर
हि से पहले शूराः का विसर्ग लुप्त होता है।
- हिhi
क्योंकि, निश्चय ही
- प्रणतिप्रियाःpraṇatipriyāḥ
विनम्र प्रणाम को प्रिय मानने वाले
प्रणति + प्रिय; प्रणति का अर्थ झुकना या आदरपूर्वक नमन करना है।
व्याख्या
वत्सराज उस राजा का स्नेहपूर्वक सम्मान करते हैं जो उनके पास आया है और भेंट अर्पित कर चुका है। 'प्रीत्या' स्वागत में अपनापन बताता है, जबकि 'प्रदत्तोपायन' आने वाले राजा की अर्पित भेंट का उल्लेख करता है। अन्तिम कथन 'शूरा हि प्रणतिप्रियाः' इस व्यवहार का कारण बताता है कि वीरों को आदरपूर्वक नमन प्रिय होता है। 'प्रणति' का मूल भाव झुकना है और राजाओं की इस भेंट में यह दूसरे राजा के अधिकार को स्वीकार करने का संकेत भी देता है। दिया गया अर्थ स्वागत की इस घटना से उदारता और सौहार्दपूर्ण व्यवहार की व्यापक सीख निकालता है। आज के मतभेदों में भी यह प्रसंग सोचने का अवसर देता है कि सम्मानपूर्वक पास आने वाले व्यक्ति के साथ दृढ़ता रखते हुए स्नेह से कैसे व्यवहार किया जाए।
मूल पोस्ट
कथासरित्सागर से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंआपत्काले च कष्टेऽपि नोत्साहस्त्यज्यते बुधैः। इति प्रबोधितस्तेन कथञ्चिद् दृढबुद्धिना॥
āpatkāle ca kaṣṭe’pi notsāhas tyajyate budhaiḥ । iti prabodhitastena kathañcid dṛḍhabuddhinā ॥
कथासरित्सागर का यह अंश सिखाता है कि बुद्धिमान लोग संकट और कठिनाई में भी अपना उत्साह नहीं छोड़ते।
इत्थं फलति शुद्धेन सिक्तं सङ्कल्पवारिणा। पुण्यबीजमपि स्वल्पं पुंसां कृषिकृतामिव॥
itthaṁ phalati śuddhena siktaṁ saṅkalpavāriṇā । puṇyabījamapi svalpaṁ puṁsāṁ kṛṣikṛtāmiva ॥
जिस प्रकार किसान द्वारा बोया गया छोटा-सा बीज भरपूर फसल देता है, उसी प्रकार शुद्ध संकल्प के साथ किया गया छोटा-सा प्रयास भी महान सफलता दिलाता है।
विचित्रचरितोल्लेखचमत्कारितचेतनम्। प्राप्यते किं यशः शुभ्रमनङ्गीकृत्य साहसम्॥
vicitracaritollekhacamatkāritacetanam । prāpyate kiṃ yaśaḥ śubhramanaṅgīkṛtya sāhasam ॥
इस श्लोक में बताया गया है कि उज्ज्वल यश और विलक्षण उपलब्धियाँ केवल साहस को अपनाने से ही प्राप्त होती हैं।
साहस पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंभस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।