आपत्काले च कष्टेऽपि - संकट में उत्साह

20 अग॰ 2026

आपत्काले च कष्टेऽपि नोत्साहस्त्यज्यते बुधैः। इति प्रबोधितस्तेन कथञ्चिद् दृढबुद्धिना॥

āpatkāle ca kaṣṭe’pi notsāhas tyajyate budhaiḥ । iti prabodhitastena kathañcid dṛḍhabuddhinā ॥

आपत्काले च कष्टेऽपि नोत्साहस्त्यज्यते का अर्थ

स्थिर और दृढ़ बुद्धि वाले ज्ञानीजन समय आने पर यह समझाते हैं कि बुद्धिमान् लोग संकट और कठिन परिस्थितियों में भी कभी अपना उत्साह नहीं खोते।

शब्दार्थ

आपत्कालेāpatkāle

आपत्ति के समय, संकट में

आपद् + काल

चca

और

कष्टेkaṣṭe

कष्ट में, कठिनाई में

कष्ट

सप्तमी एकवचन।

अपिapi

भी, यहाँ तक कि

नna

नहीं

सन्धि: न + उत्साहः = नोत्साहः।

उत्साहःutsāhaḥ

उत्साह, ऊर्जा, दृढ़ प्रयत्न

उद् + √सह्

सन्धि: उत्साहः + त्यज्यते = उत्साहस्त्यज्यते।

त्यज्यतेtyajyate

त्यागा जाता है, छोड़ा जाता है

√त्यज्

बुधैःbudhaiḥ

बुद्धिमान लोगों द्वारा

बुध

'त्यज्यते' के कर्ता को बताने वाला तृतीया बहुवचन।

इतिiti

इस प्रकार, यह कहकर

प्रबोधितःprabodhitaḥ

समझाया गया, प्रेरित किया गया

प्र + √बुध्

सन्धि: प्रबोधितः + तेन = प्रबोधितस्तेन।

तेनtena

उसके द्वारा

कथञ्चित्kathañcit

किसी प्रकार, बड़ी कठिनाई से

दृढबुद्धिना के पूर्व अन्तिम 'त्' 'द्' हो जाता है।

दृढबुद्धिनाdṛḍhabuddhinā

दृढबुद्धि द्वारा, दृढ़ बुद्धि वाले साथी द्वारा

दृढ + बुद्धि

कथा में यह एक पात्र का नाम है; इसका शाब्दिक अर्थ 'दृढ़ बुद्धि वाला' भी है।

व्याख्या

इस अंश का मूल वचन सीधा है: बुद्धिमान लोग आपत्ति और कष्ट में भी 'उत्साह', अर्थात् अपनी ऊर्जा, पहल और प्रयत्नशीलता, का त्याग नहीं करते। 'त्यज्यते' कर्मवाच्य रूप में उत्साह को उस वस्तु के रूप में रखता है जिसे छोड़ा नहीं जाना चाहिए, जबकि 'आपत्काले' और 'कष्टेऽपि' इस दृढ़ता की परीक्षा विपरीत परिस्थितियों में ही करते हैं। 'बुधैः' इस दृढ़ता को अंधे आशावाद के बजाय विवेक से जोड़ता है। संदेश यह नहीं कहता कि कठिनाई काल्पनिक है, बल्कि यह कि उसे सार्थक प्रयत्न को बुझाने नहीं देना चाहिए। कथासरित्सागर की कथा में 'दृढबुद्धि' सुन्दरसेन के स्थिरचित्त साथी का नाम है, जो मन्दारवती के छिन जाने के बाद शोकाकुल राजकुमार को फिर कर्म के लिए प्रेरित करता है। दिया गया अर्थ 'दृढबुद्धि' को स्थिर और दृढ़ बुद्धि के रूप में भी पढ़ता है, जो इस नाम और चरित्र की भूमिका दोनों के अनुकूल है। उद्धृत दोनों पंक्तियाँ क्रमिक श्लोकों के पूर्वार्ध हैं, इसलिए दूसरी पंक्ति अपना कथात्मक अर्थ बनाए रखती है: 'इस प्रकार दृढबुद्धि द्वारा किसी प्रकार समझाए जाने पर।'

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कथासरित्सागर से और सुभाषित

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9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
15 अप्रैल 2026
कथासरित्सागर

इत्थं फलति शुद्धेन सिक्तं सङ्कल्पवारिणा। पुण्यबीजमपि स्वल्पं पुंसां कृषिकृतामिव॥

itthaṁ phalati śuddhena siktaṁ saṅkalpavāriṇā । puṇyabījamapi svalpaṁ puṁsāṁ kṛṣikṛtāmiva ॥

जिस प्रकार किसान द्वारा बोया गया छोटा-सा बीज भरपूर फसल देता है, उसी प्रकार शुद्ध संकल्प के साथ किया गया छोटा-सा प्रयास भी महान सफलता दिलाता है।

कर्मकृषिदृढ़तासफलता
30 मार्च 2026
कथासरित्सागर

विचित्रचरितोल्लेखचमत्कारितचेतनम्। प्राप्यते किं यशः शुभ्रमनङ्गीकृत्य साहसम्॥

vicitracaritollekhacamatkāritacetanam । prāpyate kiṃ yaśaḥ śubhramanaṅgīkṛtya sāhasam ॥

इस श्लोक में बताया गया है कि उज्ज्वल यश और विलक्षण उपलब्धियाँ केवल साहस को अपनाने से ही प्राप्त होती हैं।

साहससफलता

दृढ़ता पर और सुभाषित

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1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
25 सित॰ 2026
योगवासिष्ठ

यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु फलं तथा। इति पौरुषमेवास्ति दैवमस्तु तदेव च॥

yathā yathā prayatnaḥ syād bhaved āśu phalaṃ tathā । iti pauruṣam evāsti daivam astu tad eva ca ॥

योगवासिष्ठ का यह श्लोक फल को मनुष्य के प्रयत्न से जोड़ता है और पुरुषार्थ को ही दैव मानने की शिक्षा देता है।

दृढ़तासफलता