विचित्रचरितोल्लेखचमत्कारितचेतनम्। प्राप्यते किं यशः शुभ्रमनङ्गीकृत्य साहसम्॥
vicitracaritollekhacamatkāritacetanam । prāpyate kiṃ yaśaḥ śubhramanaṅgīkṛtya sāhasam ॥
प्रधानमंत्री का संदेशमहान स्वतंत्रता सेनानी श्यामजी कृष्ण वर्मा के जीवन से हमें साहस और हौसले की अद्भुत प्रेरणा मिलती है। यह देशवासियों में राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वहन की भावना भी भरता है।
विचित्रचरितोल्लेखचमत्कारितचेतनम् का अर्थ
विलक्षण कार्यों के वर्णन से मन को चमत्कृत करने वाला उज्ज्वल यश केवल साहस को धारण करने से ही प्राप्त किया जाता है।
शब्दार्थ
- विचित्रचरितोल्लेखचमत्कारितचेतनम्vicitracaritollekhacamatkāritacetanam
विलक्षण चरित्र के वर्णन से चित्त को चमत्कृत करने वाला
विचित्र + √चर् + उद् + √लिख् + चमत्कार + चेतस्
- प्राप्यतेprāpyate
प्राप्त होता है
प्र + √आप्
- किम्kim
क्या, कैसे
किम्
- यशःyaśaḥ
यश
यशस्
- शुभ्रम्śubhram
उज्ज्वल
√शुभ्
- अनङ्गीकृत्यanaṅgīkṛtya
स्वीकार किए बिना
अन् + अङ्गी + √कृ
- साहसम्sāhasam
साहस
सहस्
व्याख्या
यह सुभाषित स्पष्ट करता है कि संसार में जो यश मनुष्य के व्यक्तित्व को चमत्कृत कर देता है, उसकी नींव में साहस होता है। प्रधानमंत्री ने इस श्लोक के माध्यम से क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा के साहसी जीवन को नमन किया है। यह संदेश देता है कि बिना चुनौतियों को स्वीकार किए और बिना साहस दिखाए कोई भी व्यक्ति इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित नहीं करा सकता। प्रसंग उपयुक्त है। सोमदेव का 'कथासरित्सागर' बृहत्कथा का ग्यारहवीं शताब्दी का काश्मीरी पुनर्कथन है और पूर्णतः साहसकथाओं से बना है—असाधारण जीवनों से रचा गया ग्रन्थ ही उस श्लोक का स्वाभाविक स्थान है जो कहता है कि जीवन कहने योग्य केवल साहस से बनता है। 'उल्लेख' शब्द अर्थात् लिखित वर्णन, इसी दृष्टि को बनाए रखता है: श्लोक उस कथा का विचार कर रहा है जो बाद में कही जाएगी।
मूल पोस्ट
कथासरित्सागर से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
आपत्काले च कष्टेऽपि नोत्साहस्त्यज्यते बुधैः। इति प्रबोधितस्तेन कथञ्चिद् दृढबुद्धिना॥
āpatkāle ca kaṣṭe’pi notsāhas tyajyate budhaiḥ । iti prabodhitastena kathañcid dṛḍhabuddhinā ॥
कथासरित्सागर का यह अंश सिखाता है कि बुद्धिमान लोग संकट और कठिनाई में भी अपना उत्साह नहीं छोड़ते।
इत्थं फलति शुद्धेन सिक्तं सङ्कल्पवारिणा। पुण्यबीजमपि स्वल्पं पुंसां कृषिकृतामिव॥
itthaṁ phalati śuddhena siktaṁ saṅkalpavāriṇā । puṇyabījamapi svalpaṁ puṁsāṁ kṛṣikṛtāmiva ॥
जिस प्रकार किसान द्वारा बोया गया छोटा-सा बीज भरपूर फसल देता है, उसी प्रकार शुद्ध संकल्प के साथ किया गया छोटा-सा प्रयास भी महान सफलता दिलाता है।
साहस पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।