दैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्। न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति॥
daivaṁ puruṣakāreṇa yaḥ samarthaḥ prabādhitum । na daivena vipannārthaḥ puruṣaḥ so’vasīdati ॥
दैवं पुरुषकारेण यः समर्थः का अर्थ
जो मनुष्य अपने दृढ़ संकल्प, अथक परिश्रम और पुरुषार्थ से प्रतिकूल परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाने का सामर्थ्य रखता है, वह जीवन की बाधाओं से कभी पराजित नहीं होता बल्कि निरंतर प्रयास करते हुए सफलता प्राप्त करता है।
शब्दार्थ
- दैवम्daivam
दैव को
देव
- पुरुषकारेणpuruṣakāreṇa
पुरुषार्थ से
पुरुष + √कृ
- यःyaḥ
जो
यद्
- समर्थःsamarthaḥ
समर्थ है
सम् + अर्थ
- प्रबाधितुम्prabādhitum
रोकने में
प्र + √बाध्
- नna
नहीं
- दैवेनdaivena
दैव से
देव
- विपन्नार्थःvipannārthaḥ
जिसके प्रयोजन नष्ट हुए
वि + √पद् + अर्थ
- पुरुषःpuruṣaḥ
पुरुष
पुरुष
- सः अवसीदतिso'vasīdati
वह धँसता है
अव + √सद्
व्याख्या
यह श्लोक दैव यानी भाग्य या परिस्थितियों और पुरुषकार यानी दृढ़ मानवीय प्रयास के बीच का अंतर स्पष्ट करता है। जो व्यक्ति दैव की बाधा का सामना करने में समर्थ है, वह अपने प्रयोजन पर संकट आने पर भी अवसाद में नहीं डूबता। श्लोक कठिनाइयों के अस्तित्व से इनकार नहीं करता, बल्कि उन्हें अंतिम नियति मानकर बैठ जाने से रोकता है। अयोध्या काण्ड में लक्ष्मण श्रीराम को इसी तर्क से साहस और कर्म के लिए प्रेरित करते हैं। आज के जीवन में यह शिक्षा बताती है कि निरंतर प्रयास, संकल्प और साहस कठिन परिस्थितियों की दिशा बदलने की शक्ति रखते हैं।
मूल पोस्ट
वाल्मीकि रामायण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंलोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥ दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥
lokapālāśca te sarve vāsavapramukhāstathā । ṛtavaḥ ṣaṭ ca te sarve māsāḥ saṁvatsarāḥ kṣapāḥ ॥ dināni ca muhūrtāśca svasti kurvantu te sadā । śrutiḥ smṛtiśca dharmaśca pātu tvāṁ putra sarvataḥ ॥
अयोध्या काण्ड के इस आशीर्वचन में लोकपालों, कालचक्र, श्रुति-स्मृति और धर्म से निरंतर मंगल तथा सर्वांगीण रक्षा की प्रार्थना की गई है।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्। अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥
anirvedaḥ śriyo mūlam anirvedaḥ paraṁ sukham । anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ ॥
वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड का यह श्लोक बताता है कि निराशा से मुक्त उत्साह, दृढ़ विश्वास और सतत प्रयास ही उन्नति और सफलता का आधार हैं।
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः। करोति सफलं जन्तोः कर्म यच्च करोति सः॥
anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ । karoti saphalaṁ jantoḥ karma yacca karoti saḥ ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि किस प्रकार उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा किसी भी कार्य को सफल बनाने के लिए आवश्यक हैं।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।