श्रूयतां धर्मसर्वस्वं - धर्म का सार

31 मार्च 2026

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥

śrūyatāṃ dharmasarvasvaṃ śrutvā caivāvadhāryatām । ātmanaḥ pratikūlāni pareṣāṃ na samācaret ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

सत्य, सद्भाव, सद्व्यवहार और समानता पर आधारित भगवान महावीर के संदेशों में अद्भुत प्रेरणा है। उनके महान विचार सदैव मानवता के पथ-प्रदर्शक बने रहेंगे।

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा का अर्थ

जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए सदैव उत्तम और अनुकरणीय बातों को सुनें तथा उनका पालन करें। जो व्यवहार हमें स्वयं के लिए अच्छा न लगे, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ कभी न करें।

शब्दार्थ

श्रूयताम्śrūyatām

सुना जाए

√श्रु

धर्मसर्वस्वम्dharmasarvasvam

धर्म का सर्वस्व

धर्म + सर्वस्व

श्रुत्वाśrutvā

सुनकर

√श्रु

च एवcaiva

और

अवधार्यताम्avadhāryatām

धारण किया जाए

अव + √धृ

आत्मनःātmanaḥ

अपने को

आत्मन्

प्रतिकूलानिpratikūlāni

प्रतिकूल बातें

प्रति + कूल

परेषाम्pareṣām

दूसरों के प्रति

पर

न समाचरेत्na samācaret

आचरण न करे

सम् + आ + √चर्

व्याख्या

यह सुभाषित उस सार्वभौमिक सुवर्ण नियम को प्रतिपादित करता है जो समस्त नैतिक आचरण की आधारशिला है। प्रधानमंत्री ने महावीर जयंती के अवसर पर इस श्लोक के माध्यम से भगवान महावीर की सत्य, सद्भाव और समानता की शिक्षाओं से इसका सीधा संबंध स्थापित किया। पञ्चतन्त्र और पद्म पुराण दोनों में इस श्लोक की उपस्थिति यह सिद्ध करती है कि पारस्परिक सहानुभूति का यह सिद्धांत भारतीय चिंतन में कितनी गहराई से रचा-बसा है। नियम आने से पूर्व दो कर्मवाच्य विधि-रूप उसकी भूमिका बनाते हैं—'श्रूयताम्' अर्थात् सुना जाए, और 'अवधार्यताम्' अर्थात् धारण किया जाए—अतः श्लोक पालन से पहले स्मरण की माँग करता है। 'धर्मसर्वस्वम्' समास बहुत बड़ा दावा करता है: धर्म का कोई एक नियम नहीं, अपितु सम्पूर्ण धर्म, एक ही पंक्ति में समेटा हुआ।

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पञ्चतन्त्र से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
16 सित॰ 2026
महाभारत

अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥

advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥

महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।

साहसज्ञानदृढ़तासमृद्धि
14 अग॰ 2026
महासुभाषितसंग्रह

उद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः कलाः। कातरा एव जल्पन्ति यद् भाव्यं तद् भविष्यति॥

udyamasya prasādena dṛśyante vividhāḥ kalāḥ । kātarā eva jalpanti yad bhāvyaṁ tad bhaviṣyati ॥

महासुभाषितसंग्रह का यह श्लोक कहता है कि उद्यम से विविध कलाएँ प्रकट होती हैं, जबकि कातर लोग भाग्य की बात भर करते हैं।

दृढ़तासाहससामर्थ्य
12 अग॰ 2026
विदुर नीति

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्। प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति॥

cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham । prasādayati yo lokaṁ taṁ loko'nuprasīdati ॥

विदुर नीति सिखाती है कि जो व्यक्ति दृष्टि, विचार, वाणी और कर्म से लोगों को प्रसन्न करता है, उसे लोगों का सद्भाव भी प्राप्त होता है।

सामंजस्यकर्म

नैतिकता पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य