पञ्चतन्त्र से सुभाषित

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यह स्रोत 6 विषयों में फैले 8 सुभाषित प्रदान करता है।

नवीनतम अद्यतन: 14 अग॰ 2026

संबंधित मार्गदर्शिकाएँ और श्लोक चयन

सुभाषित क्या है?
सुभाषित सुन्दर और सार्थक ढंग से कही गई स्मरणीय संस्कृत उक्ति है—प्रायः ऐसा स्वतंत्र पद्य जो ज्ञान, सलाह, अनुभव या किसी पूर्ण विचार को व्यक्त करता है।
श्लोक और सुभाषित में क्या अंतर है?
श्लोक मुख्यतः संस्कृत पद्य या छन्दबद्ध स्तोत्र-पंक्ति है; सुभाषित सुन्दर और स्मरणीय ढंग से कही गई सार्थक उक्ति है। अनेक सुभाषित श्लोक होते हैं, किंतु दोनों शब्द समान नहीं हैं।
अर्थ सहित संस्कृत श्लोक
संस्कृत ज्ञान का विचारपूर्वक चुना गया परिचय—देवनागरी पाठ, IAST लिप्यंतरण, हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ, स्रोत और विस्तृत व्याख्या सहित।
प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक
उत्साह, साहस, अनुशासन, धैर्य और निरंतर पुरुषार्थ पर संस्कृत श्लोक—अर्थ और व्यावहारिक संदर्भ सहित।
जीवन पर संस्कृत श्लोक
विवेकपूर्ण कर्म, सत्य, चरित्र, संबंध, आत्मसंयम और श्रेष्ठ जीवन को आकार देने वाले दैनिक निर्णयों पर संस्कृत श्लोक।
14 अग॰ 2026
महासुभाषितसंग्रह

उद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः कलाः। कातरा एव जल्पन्ति यद् भाव्यं तद् भविष्यति॥

udyamasya prasādena dṛśyante vividhāḥ kalāḥ । kātarā eva jalpanti yad bhāvyaṁ tad bhaviṣyati ॥

महासुभाषितसंग्रह का यह श्लोक कहता है कि उद्यम से विविध कलाएँ प्रकट होती हैं, जबकि कातर लोग भाग्य की बात भर करते हैं।

दृढ़तासाहससामर्थ्य
3 अग॰ 2026
पञ्चतन्त्र

त्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि दैवे धैर्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः। याते समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति कर्म एव॥

tyājyaṁ na dhairyaṁ vidhure'pi daive dhairyāt kadācit sthitim āpnuyāt saḥ । yāte samudre'pi ca potabhaṅge sāṁyātriko vāñchati karma eva ॥

प्रतिकूल भाग्य में भी धैर्य और कर्म मनुष्य को पुनः संभलने की राह देते हैं, जैसे पोत टूटने पर भी समुद्रयात्री प्रयास करता रहता है।

दृढ़ताकर्म
24 जून 2026
पञ्चतन्त्र

यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता। नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम्॥

yatrotsāhasamārambho yatrālasyavihīnatā । nayavikramasaṃyogas tatra śrīr acalā dhruvam ॥

पञ्चतन्त्र का यह श्लोक बताता है कि उत्साह, आलस्यहीनता, नीति और पराक्रम के मेल से समृद्धि स्थिर और चिरस्थायी बनती है।

दृढ़ताअनुशासनसाहससफलता
4 मई 2026
चाणक्य नीति

को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्। को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम्॥

ko hi bhāraḥ samarthānāṁ kiṁ dūraṁ vyavasāyinām । ko videśaḥ suvidyānāṁ kaḥ paraḥ priyavādinām ॥

यह श्लोक बताता है कि कैसे कौशल, परिश्रम, शिक्षा और मधुर वाणी सफलता और अपनेपन की सभी बाधाओं को दूर कर देते हैं।

सामर्थ्यशिक्षादृढ़ताचरित्र
14 अप्रैल 2026
पञ्चतन्त्र

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

ayaṁ nijaḥ paro veti gaṇanā laghucetasām । udāracaritānāṁ tu vasudhaiva kuṭumbakam ॥

संकुचित मनुष्य लोगों को अपना और पराया मानता है, जबकि उदार हृदय वाला पूरे विश्व को एक परिवार समझता है।

एकताज्ञाननैतिकतासामंजस्य
31 मार्च 2026
पञ्चतन्त्र

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥

śrūyatāṃ dharmasarvasvaṃ śrutvā caivāvadhāryatām । ātmanaḥ pratikūlāni pareṣāṃ na samācaret ॥

यह सुभाषित धर्म के समस्त सार को एक सुवर्ण नियम में समेटता है — जो व्यवहार अपने लिए अनुचित लगे, वह दूसरों के साथ कभी न करें।

नैतिकताधर्मचरित्र
24 फ़र॰ 2026
पञ्चतन्त्र

यथैकेन न हस्तेन तालिका सम्प्रपद्यते। तथोद्यमपरित्यक्तं न फलं कर्मणः स्मृतम्॥

yathaikena na hastena tālikā samprapadyate । tathodyamaparityaktaṃ na phalaṃ karmaṇaḥ smṛtam ॥

जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बजती, उसी प्रकार बिना परिश्रम के किसी भी कार्य में सफलता फलित नहीं होती।

दृढ़ताकर्मअनुशासनसफलता
5 जन॰ 2026
पञ्चतन्त्र

वनानि दहतो वह्नेः सखा भवति मारुतः। स एव दीपनाशाय कृशे कस्यास्ति सौहृदम्॥

vanāni dahato vahneḥ sakhā bhavati mārutaḥ । sa eva dīpanāśāya kṛśe kasyāsti sauhṛdam ॥

जंगल की आग को हवा बढ़ावा देती है, पर वही हवा दीपक को बुझा देती है। यह श्लोक हमें स्वयं को सामर्थ्यवान बनाने की महत्ता सिखाता है।

शक्तिआत्मविश्वासज्ञान