पञ्चतन्त्र से सुभाषित
यह स्रोत 6 विषयों में फैले 8 सुभाषित प्रदान करता है।
नवीनतम अद्यतन: 14 अग॰ 2026
संबंधित मार्गदर्शिकाएँ और श्लोक चयन
उद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः कलाः। कातरा एव जल्पन्ति यद् भाव्यं तद् भविष्यति॥
udyamasya prasādena dṛśyante vividhāḥ kalāḥ । kātarā eva jalpanti yad bhāvyaṁ tad bhaviṣyati ॥
महासुभाषितसंग्रह का यह श्लोक कहता है कि उद्यम से विविध कलाएँ प्रकट होती हैं, जबकि कातर लोग भाग्य की बात भर करते हैं।
त्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि दैवे धैर्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः। याते समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति कर्म एव॥
tyājyaṁ na dhairyaṁ vidhure'pi daive dhairyāt kadācit sthitim āpnuyāt saḥ । yāte samudre'pi ca potabhaṅge sāṁyātriko vāñchati karma eva ॥
प्रतिकूल भाग्य में भी धैर्य और कर्म मनुष्य को पुनः संभलने की राह देते हैं, जैसे पोत टूटने पर भी समुद्रयात्री प्रयास करता रहता है।
यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता। नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम्॥
yatrotsāhasamārambho yatrālasyavihīnatā । nayavikramasaṃyogas tatra śrīr acalā dhruvam ॥
पञ्चतन्त्र का यह श्लोक बताता है कि उत्साह, आलस्यहीनता, नीति और पराक्रम के मेल से समृद्धि स्थिर और चिरस्थायी बनती है।
को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्। को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम्॥
ko hi bhāraḥ samarthānāṁ kiṁ dūraṁ vyavasāyinām । ko videśaḥ suvidyānāṁ kaḥ paraḥ priyavādinām ॥
यह श्लोक बताता है कि कैसे कौशल, परिश्रम, शिक्षा और मधुर वाणी सफलता और अपनेपन की सभी बाधाओं को दूर कर देते हैं।
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
ayaṁ nijaḥ paro veti gaṇanā laghucetasām । udāracaritānāṁ tu vasudhaiva kuṭumbakam ॥
संकुचित मनुष्य लोगों को अपना और पराया मानता है, जबकि उदार हृदय वाला पूरे विश्व को एक परिवार समझता है।
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥
śrūyatāṃ dharmasarvasvaṃ śrutvā caivāvadhāryatām । ātmanaḥ pratikūlāni pareṣāṃ na samācaret ॥
यह सुभाषित धर्म के समस्त सार को एक सुवर्ण नियम में समेटता है — जो व्यवहार अपने लिए अनुचित लगे, वह दूसरों के साथ कभी न करें।
यथैकेन न हस्तेन तालिका सम्प्रपद्यते। तथोद्यमपरित्यक्तं न फलं कर्मणः स्मृतम्॥
yathaikena na hastena tālikā samprapadyate । tathodyamaparityaktaṃ na phalaṃ karmaṇaḥ smṛtam ॥
जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बजती, उसी प्रकार बिना परिश्रम के किसी भी कार्य में सफलता फलित नहीं होती।
वनानि दहतो वह्नेः सखा भवति मारुतः। स एव दीपनाशाय कृशे कस्यास्ति सौहृदम्॥
vanāni dahato vahneḥ sakhā bhavati mārutaḥ । sa eva dīpanāśāya kṛśe kasyāsti sauhṛdam ॥
जंगल की आग को हवा बढ़ावा देती है, पर वही हवा दीपक को बुझा देती है। यह श्लोक हमें स्वयं को सामर्थ्यवान बनाने की महत्ता सिखाता है।