वनानि दहतो वह्नेः - सामर्थ्य और सौहार्द

5 जन॰ 2026

वनानि दहतो वह्नेः सखा भवति मारुतः। स एव दीपनाशाय कृशे कस्यास्ति सौहृदम्॥

vanāni dahato vahneḥ sakhā bhavati mārutaḥ । sa eva dīpanāśāya kṛśe kasyāsti sauhṛdam ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

हमारी महान संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत अनगिनत हमलों की भी साक्षी रही है। यह देशवासियों की सामूहिक शक्ति ही है, जिसने हमारी सांस्कृतिक धरोहर को हमेशा अक्षुण्ण रखा है।

वनानि दहतो वह्नेः सखा का अर्थ

जब जंगल में आग लग जाती है तो हवा उसकी सहायिका बनकर आग को फैलने में मदद करती है, लेकिन वही हवा एक छोटे-से दीपक को पलक झपकते ही बुझा देती है। सच ही है, कमजोर व्यक्ति का कोई मित्र नहीं होता! अतः स्वयं सामर्थ्यवान् बनें।

शब्दार्थ

वनानिvanāni

वनों को

वन

दहतःdahataḥ

जलाती हुई

√दह्

वह्नेःvahneḥ

अग्नि का

√वह्

सखाsakhā

मित्र

सखि

भवतिbhavati

होती है

√भू

मारुतःmārutaḥ

वायु

मरुत्

सः एवsa eva

वही

तद्

दीपनाशायdīpanāśāya

दीपक के नाश के लिए

दीप + √नश्

कृशेkṛśe

दुर्बल पर

√कृश्

कस्य अस्तिkasyāsti

किसका होता है

किम् + √अस्

सौहृदम्sauhṛdam

सौहार्द

सु + हृद्

व्याख्या

पंचतंत्र का यह श्लोक संसार के एक कठोर व्यावहारिक सत्य को उजागर करता है: शक्ति ही सहायता को आकर्षित करती है। अग्नि और वायु के उदाहरण से यह समझाया गया है कि बाहरी परिस्थितियाँ (हवा) केवल सामर्थ्य (जंगल की आग) का साथ देती हैं और उसे बढ़ाती हैं, जबकि कमजोरी (दीपक) को नष्ट कर देती हैं। यह व्यक्ति और राष्ट्र को आत्मनिर्भर और शक्तिशाली बनने का संदेश देता है, क्योंकि 'कृशे कस्यास्ति सौहृदम्' (कमजोर का मित्र कौन है?)। इसका स्थान इसे और तीक्ष्ण बनाता है। यह पंचतन्त्र के 'काकोलूकीयम्' से है, जो काक और उलूक का तन्त्र है और आद्यन्त युद्ध, सन्धि तथा सहायता के अवसर का विवेचन करता है। अतः यह श्लोक उस व्यक्ति को दिया गया परामर्श है जो यह तौल रहा है कि सहायता मिलेगी या नहीं; और उत्तर यह है कि वही वायु किसके पास पहुँचती है, इसी से वह मित्र या विनाशक बनती है—सहायता आवश्यकता के पीछे नहीं, सामर्थ्य के पीछे जाती है, इसलिए पहले सामर्थ्य ही अर्जित करना होता है।

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पञ्चतन्त्र से और सुभाषित

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14 अग॰ 2026
महासुभाषितसंग्रह

उद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः कलाः। कातरा एव जल्पन्ति यद् भाव्यं तद् भविष्यति॥

udyamasya prasādena dṛśyante vividhāḥ kalāḥ । kātarā eva jalpanti yad bhāvyaṁ tad bhaviṣyati ॥

महासुभाषितसंग्रह का यह श्लोक कहता है कि उद्यम से विविध कलाएँ प्रकट होती हैं, जबकि कातर लोग भाग्य की बात भर करते हैं।

दृढ़तासाहससामर्थ्य
3 अग॰ 2026
पञ्चतन्त्र

त्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि दैवे धैर्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः। याते समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति कर्म एव॥

tyājyaṁ na dhairyaṁ vidhure'pi daive dhairyāt kadācit sthitim āpnuyāt saḥ । yāte samudre'pi ca potabhaṅge sāṁyātriko vāñchati karma eva ॥

प्रतिकूल भाग्य में भी धैर्य और कर्म मनुष्य को पुनः संभलने की राह देते हैं, जैसे पोत टूटने पर भी समुद्रयात्री प्रयास करता रहता है।

दृढ़ताकर्म
24 जून 2026
पञ्चतन्त्र

यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता। नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम्॥

yatrotsāhasamārambho yatrālasyavihīnatā । nayavikramasaṃyogas tatra śrīr acalā dhruvam ॥

पञ्चतन्त्र का यह श्लोक बताता है कि उत्साह, आलस्यहीनता, नीति और पराक्रम के मेल से समृद्धि स्थिर और चिरस्थायी बनती है।

दृढ़ताअनुशासनसाहससफलता

शक्ति पर और सुभाषित

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29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
16 सित॰ 2026
महाभारत

अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥

advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥

महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।

साहसज्ञानदृढ़तासमृद्धि
8 सित॰ 2026
श्रीमद्भागवत पुराण

अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः। सर्वतः सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पदः॥

aṇubhyaśca mahadbhyaśca śāstrebhyaḥ kuśalo naraḥ । sarvataḥ sāramādadyāt puṣpebhya iva ṣaṭpadaḥ ॥

श्रीमद्भागवत पुराण का श्लोक: कुशल व्यक्ति छोटे-बड़े हर शास्त्र से सार ग्रहण करे, जैसे भ्रमर अनेक पुष्पों से मधु लेता है।

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