उत्थातव्यं जागृतव्यं - संकल्प और कर्म

2 जन॰ 2026

उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूतिकर्मसु। भविष्यतीत्येव मनः कृत्वा सततमव्यथैः॥

utthātavyaṃ jāgṛtavyaṃ yoktavyaṃ bhūtikarmasu । bhaviṣyatītyeva manaḥ kṛtvā satatam avyathaiḥ ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

मेरी कामना है कि आने वाले समय में आपको अपने हर प्रयास में सफलता मिले। दृढ़संकल्प और इच्छाशक्ति से नए साल में आपके संकल्प की सिद्धि हो।

उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूतिकर्मसु का अर्थ

सफलता होगी ही, ऐसा मन में दृढ़ विश्वास कर, सतत विषाद-रहित होकर हमें उठना चाहिए, सजग होना चाहिए और ऐश्वर्य को साधने वाले कार्यों में लग जाना चाहिए।

शब्दार्थ

उत्थातव्यम्utthātavyam

उठना चाहिए

उद् + √स्था

जागृतव्यम्jāgṛtavyam

जागते रहना चाहिए

√जागृ

योक्तव्यम्yoktavyam

जुट जाना चाहिए

√युज्

भूतिकर्मसुbhūtikarmasu

ऐश्वर्यकारी कर्मों में

√भू + कर्मन्

भविष्यतिbhaviṣyati

होगा

√भू

इति एवity eva

ऐसा ही

मनः कृत्वाmanaḥ kṛtvā

मन बनाकर

मनस् + √कृ

सततम्satatam

निरन्तर

सम् + √तन्

अव्यथैःavyathaiḥ

विषादरहित होकर

अ + √व्यथ्

व्याख्या

महाभारत का यह प्रेरक आह्वान सुस्ती और निराशा को दूर करने का एक आग्रह है। यह व्यक्ति को 'उत्थातव्यम्' (उठने) और 'जागृतव्यम्' (जागने), और 'भूतिकर्मसु' (ऐश्वर्य की ओर ले जाने वाले कार्यों) में खुद को संलग्न करने का आदेश देता है। यह एक सकारात्मक और दृढ़ मानसिकता ('भविष्यति' - यह होगा) के महत्व पर जोर देता है, यह सुझाव देता है कि उन लोगों के लिए सफलता अपरिहार्य है जो एक स्पष्ट लक्ष्य और शांत मन के साथ काम करते हैं। यह उद्योग पर्व के विदुला-सञ्जय संवाद से है, जहाँ माता उस पुत्र को जगाती है जो पराजित होकर पराजय में ही रह जाना चाहता है। यही प्रसंग इसके रूप की व्याख्या करता है: तीनों क्रियाएँ कर्तृरहित कृत्य-प्रत्यय हैं, अतः यह माँग उसी पर पड़ती है जो इसे सुनता है। अन्तिम चरण सबसे कठिन है—'भविष्यति इत्येव मनः कृत्वा', अर्थात् मन को उसी विचार का रूप दे देना कि यह होगा।

मूल पोस्ट

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महाभारत से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

दृढ़ता पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता