प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥
priyavākyapradānena sarve tuṣyanti jantavaḥ । tasmāt tadeva vaktavyaṁ vacane kā daridratā ॥
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः का अर्थ
मीठी वाणी बोलने से सभी व्यक्ति प्रसन्न और संतुष्ट होते हैं। इसलिए सदैव मधुर वचन ही बोलने चाहिए। जब वाणी हमारे अधीन है और इसका कोई मूल्य भी नहीं देना पड़ता तो फिर मीठे वचन बोलने में दरिद्रता कैसी ?
शब्दार्थ
- प्रियवाक्यप्रदानेनpriyavākyapradānena
प्रिय वचन देने से
प्रिय + वाक्य + प्र + √दा
समास—प्रिय + वाक्य + प्रदान।
- सर्वेsarve
सब
सर्व
- तुष्यन्तिtuṣyanti
सन्तुष्ट होते हैं
√तुष्
- जन्तवःjantavaḥ
प्राणी
जन्तु, √जन्
- तस्मात्tasmāt
इसलिए
तद्
- तत् एवtad eva
वही
तद् + एव
- वक्तव्यम्vaktavyam
बोलना चाहिए
√वच्
- वचनेvacane
वाणी में
वचन
- काkā
कैसी, क्या
किम्
- दरिद्रताdaridratā
दरिद्रता, कंजूसी
√दरिद्रा
अन्तिम प्रश्न—जो कुछ भी मूल्य नहीं माँगती, उस वाणी में कंजूसी क्यों?
व्याख्या
यह सुभाषित मधुर वाणी के महत्व को बहुत ही सरल ढंग से प्रस्तुत करता है। यह हमें याद दिलाता है कि शब्द हमारे वश में हैं और प्रिय वचन बोलने से न केवल दूसरों को सुख मिलता है, बल्कि हमारा अपना व्यक्तित्व भी निखरता है। यहाँ 'दरिद्रता' शब्द का प्रयोग बहुत मार्मिक है—जो चीज मुफ्त है, उसे देने में कंजूसी करना वास्तव में मन की दरिद्रता का प्रतीक है। यहाँ 'मनुष्याः' के स्थान पर 'जन्तवः' का प्रयोग सोचा-समझा है—श्लोक कहता है कि मधुर वाणी से समस्त प्राणी प्रसन्न होते हैं, केवल मनुष्य नहीं। दूसरी पंक्ति उपदेश नहीं, प्रश्न है—'वचने का दरिद्रता'—और इसीलिए यह श्लोक सदा पूरा उद्धृत किया जाता है; तर्क तभी पूर्ण होता है जब प्रश्न पूछा जाए।
मूल पोस्ट
चाणक्य नीति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंप्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥
prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥
चाणक्य नीति का यह श्लोक सिखाता है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे सिंह की तरह पूर्ण समर्पण और पूरे प्रयास से करना चाहिए।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥
jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥
यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।
विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥
vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥
यह श्लोक विद्या और विद्वानों की महिमा का गुणगान करता है। ज्ञान से न केवल सम्मान प्राप्त होता है, बल्कि जीवन की समस्त उपलब्धियाँ भी मिलती हैं।
नैतिकता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।