प्रियवाक्यप्रदानेन - वाणी की मधुरता

6 जन॰ 2026

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥

priyavākyapradānena sarve tuṣyanti jantavaḥ । tasmāt tadeva vaktavyaṁ vacane kā daridratā ॥

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः का अर्थ

मीठी वाणी बोलने से सभी व्यक्ति प्रसन्न और संतुष्ट होते हैं। इसलिए सदैव मधुर वचन ही बोलने चाहिए। जब वाणी हमारे अधीन है और इसका कोई मूल्य भी नहीं देना पड़ता तो फिर मीठे वचन बोलने में दरिद्रता कैसी ?

शब्दार्थ

प्रियवाक्यप्रदानेनpriyavākyapradānena

प्रिय वचन देने से

प्रिय + वाक्य + प्र + √दा

समास—प्रिय + वाक्य + प्रदान।

सर्वेsarve

सब

सर्व

तुष्यन्तिtuṣyanti

सन्तुष्ट होते हैं

√तुष्

जन्तवःjantavaḥ

प्राणी

जन्तु, √जन्

तस्मात्tasmāt

इसलिए

तद्

तत् एवtad eva

वही

तद् + एव

वक्तव्यम्vaktavyam

बोलना चाहिए

√वच्

वचनेvacane

वाणी में

वचन

काkā

कैसी, क्या

किम्

दरिद्रताdaridratā

दरिद्रता, कंजूसी

√दरिद्रा

अन्तिम प्रश्न—जो कुछ भी मूल्य नहीं माँगती, उस वाणी में कंजूसी क्यों?

व्याख्या

यह सुभाषित मधुर वाणी के महत्व को बहुत ही सरल ढंग से प्रस्तुत करता है। यह हमें याद दिलाता है कि शब्द हमारे वश में हैं और प्रिय वचन बोलने से न केवल दूसरों को सुख मिलता है, बल्कि हमारा अपना व्यक्तित्व भी निखरता है। यहाँ 'दरिद्रता' शब्द का प्रयोग बहुत मार्मिक है—जो चीज मुफ्त है, उसे देने में कंजूसी करना वास्तव में मन की दरिद्रता का प्रतीक है। यहाँ 'मनुष्याः' के स्थान पर 'जन्तवः' का प्रयोग सोचा-समझा है—श्लोक कहता है कि मधुर वाणी से समस्त प्राणी प्रसन्न होते हैं, केवल मनुष्य नहीं। दूसरी पंक्ति उपदेश नहीं, प्रश्न है—'वचने का दरिद्रता'—और इसीलिए यह श्लोक सदा पूरा उद्धृत किया जाता है; तर्क तभी पूर्ण होता है जब प्रश्न पूछा जाए।

मूल पोस्ट

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चाणक्य नीति से और सुभाषित

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17 जुल॰ 2026
चाणक्य नीति

प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥

prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥

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ज्ञानअनुशासनदृढ़ता
18 मई 2026
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जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥

jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥

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विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥

vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥

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चरित्रविनम्रतासामंजस्य