अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
ayaṁ nijaḥ paro veti gaṇanā laghucetasām । udāracaritānāṁ tu vasudhaiva kuṭumbakam ॥
प्रधानमंत्री का संदेशडॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का व्यक्तित्व और कृतित्व राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरणापुंज बना रहेगा।
अयं निजः परो वेति का अर्थ
उदार और विशाल हृदय वाले लोग संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर समस्त संसार को अपना परिवार मानते हैं। उनके लिए कोई भी पराया नहीं होता, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति अपना ही होता है और यही भावना प्रेम, एकता और सौहार्द का आधार बनती है।
शब्दार्थ
- अयम्ayam
यह
इदम्
- निजःnijaḥ
अपना
निज
- परःparaḥ
पराया
पर
- वाvā
अथवा
वा
- इतिiti
इस प्रकार
इति
- गणनाgaṇanā
गिनती, हिसाब
√गण्
- लघुचेतसाम्laghucetasām
संकुचित मन वालों की
लघु + चेतस्
- उदारचरितानाम्udāracaritānām
उदार चरित्र वालों के लिए
उदार + चरित
- तुtu
किन्तु
तु
- वसुधाvasudhā
पृथ्वी
वसु + √धा
वसुधा + एव = वसुधैव।
- एवeva
ही
एव
- कुटुम्बकम्kuṭumbakam
कुटुम्ब, परिवार
कुटुम्ब
व्याख्या
महोपनिषद् से उद्भूत यह मंत्र भारतीय संस्कृति के उस 'विश्व-बंधुत्व' का आधार है जो संकीर्णता से ऊपर उठकर पूरी मानवता के कल्याण की बात करता है। इसमें 'लघुचेतसाम्' (ओछी या छोटी बुद्धि वाले) और 'उदारचरितानाम्' (विशाल हृदय वाले) के बीच का अंतर स्पष्ट किया गया है। जहाँ छोटी सोच व्यक्ति को 'मेरा-तेरा' के द्वंद्व में उलझाए रखती है, वहीं उदार चरित्र वाला व्यक्ति पूरी पृथ्वी (वसुधा) को अपना ही परिवार (कुटुम्ब) मानता है। इससे गहरी एकता की प्रेरणा ली जा सकती है, पर श्लोक स्वयं किसी तत्त्वमीमांसक सिद्धान्त के बजाय संकीर्ण गणना और उदार चरित्र का अंतर बताता है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक जीवन दृष्टि है जो हमें सहिष्णुता, प्रेम और सामूहिक उन्नति की प्रेरणा देती है।
मूल पोस्ट
पञ्चतन्त्र से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।
एकता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।