इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तो अराव्णः॥
indraṁ vardhanto apturaḥ kṛṇvanto viśvamāryam । apaghnanto arāvṇaḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशजलियांवाला बाग नरसंहार के सभी अमर बलिदानियों को मेरी आदरपूर्ण श्रद्धांजलि। विदेशी हुकूमत की बर्बरता के खिलाफ उनके अदम्य साहस और स्वाभिमान की गाथा देश की हर पीढ़ी को प्रेरित करती रहेगी।
इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो का अर्थ
हे कर्मशील मनुष्यों! अपने समाज में उन कल्याणकारी शक्तियों का संवर्धन करो, जो राष्ट्र को समृद्ध, जागरूक और आत्मनिर्भर बनाती हैं। साथ ही, उन विनाशकारी शक्तियों का दृढ़तापूर्वक प्रतिरोध करो, जो समाज में विभाजन, अन्याय और असंतोष उत्पन्न करती हैं।
शब्दार्थ
- इन्द्रम्indram
इन्द्र को
इन्द्र
- वर्धन्तःvardhantaḥ
बढ़ाते हुए
√वृध्
- अप्तुरःapturaḥ
शीघ्रगामी
अप् + √तुर्
- कृण्वन्तःkṛṇvantaḥ
करते हुए
√कृ
- विश्वम्viśvam
समस्त विश्व को
विश्व
- आर्यम्āryam
आर्य, श्रेष्ठ
आर्य
इसी पंक्ति से यह ऋचा सर्वाधिक प्रसिद्ध है।
- अपघ्नन्तःapaghnantaḥ
दूर करते हुए
अप + √हन्
- अराव्णःarāvṇaḥ
अनुदार जनों को
अ + √रा
व्याख्या
ऋग्वेद का यह मन्त्र 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' के अपने अमर उद्घोष के लिए प्रसिद्ध है, जिसका अर्थ है पूरे विश्व को श्रेष्ठ (आर्य) बनाना। यह समाज के प्रत्येक जागरूक व्यक्ति के लिए दोहरे कर्तव्य का निर्धारण करता है: पहला, दैवीय और कल्याणकारी गुणों (इन्द्र) की वृद्धि करना, और दूसरा, संकीर्ण या विनाशकारी प्रवृत्तियों का अंत करना। जलियांवाला बाग के बलिदानियों की स्मृति में यह श्लोक और भी प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि उन्होंने अन्याय के विरुद्ध खड़े होकर राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा की थी। साझा अर्थ इस ऋचा को सामाजिक शक्तियों के रूपक के रूप में पढ़ता है, जबकि मूल पाठ इन्द्र का नाम लेकर उसका संवर्धन करता है और 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' अर्थात् समस्त विश्व को आर्य बनाने का संकल्प रखता है—यही पंक्ति इस ऋचा की सर्वाधिक प्रसिद्ध पंक्ति है।
मूल पोस्ट
ऋग्वेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।
तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्। अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥
tantuṃ tanvan rajaso bhānum anv ihi jyotiṣmataḥ patho rakṣa dhiyā kṛtān । anulbaṇaṃ vayata joguvām apo manur bhava janayā daivyaṃ janam ॥
ऋग्वेद का यह मन्त्र बुद्धि से निर्मित ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा और सच्चा मनुष्य बनकर दैवी गुणों से युक्त जन के निर्माण का आह्वान करता है।
धर्म पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।