यथैकेन न हस्तेन तालिका सम्प्रपद्यते। तथोद्यमपरित्यक्तं न फलं कर्मणः स्मृतम्॥
yathaikena na hastena tālikā samprapadyate । tathodyamaparityaktaṃ na phalaṃ karmaṇaḥ smṛtam ॥
यथैकेन न हस्तेन तालिका का अर्थ
जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बजती, उसी प्रकार नवाचार में बिना प्रयास के सफलता संभव नहीं होती। प्रतिभा तभी फलित होती है जब उसे परिश्रम और निरंतर कर्म का साथ मिलता रहे।
शब्दार्थ
- यथाyathā
जिस प्रकार
यथा
- एकेनekena
एक से
एक
- नna
नहीं
न
- हस्तेनhastena
हाथ से
हस्त
- तालिकाtālikā
ताली
ताल
- सम्प्रपद्यतेsamprapadyate
उत्पन्न होती है
सम् + प्र + √पद्
- तथाtathā
उसी प्रकार
तथा
- उद्यमपरित्यक्तम्udyamaparityaktam
उद्यम से रहित
उद्यम + परि + √त्यज्
श्लोक का केन्द्र—उद्यम अर्थात् प्रयत्न का अभाव।
- फलम्phalam
फल
फल
- कर्मणःkarmaṇaḥ
कर्म का
कर्मन्, √कृ
- स्मृतम्smṛtam
माना गया है
√स्मृ
व्याख्या
ताली का रूपक श्लोक की बात तुरंत स्पष्ट कर देता है—एक हाथ अकेला अपेक्षित ध्वनि उत्पन्न नहीं कर सकता। इसी प्रकार इच्छा, प्रतिभा या अनुकूल परिस्थिति के साथ ‘उद्यम’, अर्थात सचेत प्रयास, न जुड़ा हो तो फल उत्पन्न नहीं होता। यह आवश्यक योगदान की बात है, यह दावा नहीं कि केवल प्रयास ही हर परिणाम को नियंत्रित करता है। नवाचार या उद्यम में किसी विचार को उपयोगी बनने से पहले परीक्षण, श्रम और निरंतरता से जुड़ना पड़ता है। दृष्टि और परिश्रम दो हाथों की तरह साथ काम करते हैं; किसी एक के बिना प्रक्रिया अधूरी रहती है। साझा अर्थ में नवाचार और प्रतिभा का उल्लेख है, जो मूल पाठ में नहीं है। श्लोक 'उद्यमपरित्यक्तम्' कहता है—प्रयास छोड़ देने पर कर्म का फल नहीं मिलता; इसका विषय उद्यम है, प्रतिभा नहीं।
मूल पोस्ट
पञ्चतन्त्र से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंउद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः कलाः। कातरा एव जल्पन्ति यद् भाव्यं तद् भविष्यति॥
udyamasya prasādena dṛśyante vividhāḥ kalāḥ । kātarā eva jalpanti yad bhāvyaṁ tad bhaviṣyati ॥
महासुभाषितसंग्रह का यह श्लोक कहता है कि उद्यम से विविध कलाएँ प्रकट होती हैं, जबकि कातर लोग भाग्य की बात भर करते हैं।
त्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि दैवे धैर्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः। याते समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति कर्म एव॥
tyājyaṁ na dhairyaṁ vidhure'pi daive dhairyāt kadācit sthitim āpnuyāt saḥ । yāte samudre'pi ca potabhaṅge sāṁyātriko vāñchati karma eva ॥
प्रतिकूल भाग्य में भी धैर्य और कर्म मनुष्य को पुनः संभलने की राह देते हैं, जैसे पोत टूटने पर भी समुद्रयात्री प्रयास करता रहता है।
यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता। नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम्॥
yatrotsāhasamārambho yatrālasyavihīnatā । nayavikramasaṃyogas tatra śrīr acalā dhruvam ॥
पञ्चतन्त्र का यह श्लोक बताता है कि उत्साह, आलस्यहीनता, नीति और पराक्रम के मेल से समृद्धि स्थिर और चिरस्थायी बनती है।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।