विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं - ज्ञान के वृक्ष की जड़

25 फ़र॰ 2026

विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्। तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्॥

vipro vṛkṣas tasya mūlaṃ ca sandhyā vedāḥ śākhā dharmakarmāṇi patram । tasmāt mūlaṃ yatnato rakṣaṇīyaṃ chinne mūle naiva śākhā na patram ॥

विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च का अर्थ

ज्ञानी व्यक्ति एक वृक्ष के समान होता है। उस ज्ञानरूपी वृक्ष की जड़ नित्य उपासना है। वेद उसकी शाखाएँ हैं और अच्छे कर्म उसके पत्ते हैं। इसलिए उस जड़ की विशेष देखभाल करनी चाहिए, क्योंकि जड़ नष्ट हो जाने पर न शाखाएँ बचती हैं और न पत्ते।

शब्दार्थ

विप्रःvipraḥ

विप्र

विप्र

वृक्षःvṛkṣaḥ

वृक्ष है

वृक्ष

तस्य मूलम्tasya mūlam

उसका मूल

मूल

च सन्ध्याca sandhyā

सन्ध्या है

सम् + √ध्या

वेदाः शाखाःvedāḥ śākhāḥ

वेद शाखाएँ हैं

√विद् + शाखा

धर्मकर्माणिdharmakarmāṇi

धर्मकर्म

धर्म + कर्मन्

पत्रम्patram

पत्ते

पत्र

तस्मात्tasmāt

इसलिए

तद्

मूलम् यत्नतःmūlaṁ yatnataḥ

मूल की यत्नपूर्वक

मूल + √यत्

रक्षणीयम्rakṣaṇīyam

रक्षा करनी चाहिए

√रक्ष्

छिन्ने मूलेchinne mūle

मूल कट जाने पर

√छिद्

न एव शाखा न पत्रम्naiva śākhā na patram

न शाखा रहती है न पत्ते

व्याख्या

यह श्लोक आध्यात्मिक जीवन की संरचना को समझाने के लिए एक वृक्ष के रूपक का उपयोग करता है। जैसे कोई वृक्ष अपनी जड़ों के बिना जीवित नहीं रह सकता, वैसे ही एक ज्ञानी व्यक्ति का ज्ञान (वेद) और कर्म (धर्म) नियमित आध्यात्मिक अभ्यास (संध्या) की नींव के बिना नहीं फल-फूल सकते। यह हमें उन मौलिक मूल्यों और अभ्यासों को प्राथमिकता देने की याद दिलाता है जो हमारे विकास और चरित्र को बनाए रखते हैं। साझा अर्थ 'विप्र' को 'ज्ञानी व्यक्ति' कहता है। मूल श्लोक ब्राह्मण के नित्यकर्म का रूपक रचता है, जिसमें संध्या मूल है और वेद शाखाएँ; व्यापक पाठ उचित तो है, किन्तु मूल पाठ का विषय विशिष्ट है।

मूल पोस्ट

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चाणक्य नीति

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prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥

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