विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्। तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्॥
vipro vṛkṣas tasya mūlaṃ ca sandhyā vedāḥ śākhā dharmakarmāṇi patram । tasmāt mūlaṃ yatnato rakṣaṇīyaṃ chinne mūle naiva śākhā na patram ॥
विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च का अर्थ
ज्ञानी व्यक्ति एक वृक्ष के समान होता है। उस ज्ञानरूपी वृक्ष की जड़ नित्य उपासना है। वेद उसकी शाखाएँ हैं और अच्छे कर्म उसके पत्ते हैं। इसलिए उस जड़ की विशेष देखभाल करनी चाहिए, क्योंकि जड़ नष्ट हो जाने पर न शाखाएँ बचती हैं और न पत्ते।
शब्दार्थ
- विप्रःvipraḥ
विप्र
विप्र
- वृक्षःvṛkṣaḥ
वृक्ष है
वृक्ष
- तस्य मूलम्tasya mūlam
उसका मूल
मूल
- च सन्ध्याca sandhyā
सन्ध्या है
सम् + √ध्या
- वेदाः शाखाःvedāḥ śākhāḥ
वेद शाखाएँ हैं
√विद् + शाखा
- धर्मकर्माणिdharmakarmāṇi
धर्मकर्म
धर्म + कर्मन्
- पत्रम्patram
पत्ते
पत्र
- तस्मात्tasmāt
इसलिए
तद्
- मूलम् यत्नतःmūlaṁ yatnataḥ
मूल की यत्नपूर्वक
मूल + √यत्
- रक्षणीयम्rakṣaṇīyam
रक्षा करनी चाहिए
√रक्ष्
- छिन्ने मूलेchinne mūle
मूल कट जाने पर
√छिद्
- न एव शाखा न पत्रम्naiva śākhā na patram
न शाखा रहती है न पत्ते
व्याख्या
यह श्लोक आध्यात्मिक जीवन की संरचना को समझाने के लिए एक वृक्ष के रूपक का उपयोग करता है। जैसे कोई वृक्ष अपनी जड़ों के बिना जीवित नहीं रह सकता, वैसे ही एक ज्ञानी व्यक्ति का ज्ञान (वेद) और कर्म (धर्म) नियमित आध्यात्मिक अभ्यास (संध्या) की नींव के बिना नहीं फल-फूल सकते। यह हमें उन मौलिक मूल्यों और अभ्यासों को प्राथमिकता देने की याद दिलाता है जो हमारे विकास और चरित्र को बनाए रखते हैं। साझा अर्थ 'विप्र' को 'ज्ञानी व्यक्ति' कहता है। मूल श्लोक ब्राह्मण के नित्यकर्म का रूपक रचता है, जिसमें संध्या मूल है और वेद शाखाएँ; व्यापक पाठ उचित तो है, किन्तु मूल पाठ का विषय विशिष्ट है।
मूल पोस्ट
चाणक्य नीति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंप्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥
prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥
चाणक्य नीति का यह श्लोक सिखाता है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे सिंह की तरह पूर्ण समर्पण और पूरे प्रयास से करना चाहिए।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥
jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥
यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।
विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥
vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥
यह श्लोक विद्या और विद्वानों की महिमा का गुणगान करता है। ज्ञान से न केवल सम्मान प्राप्त होता है, बल्कि जीवन की समस्त उपलब्धियाँ भी मिलती हैं।
विद्या पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।