पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः - निःस्वार्थ सेवा का आदर्श

1 अप्रैल 2026

पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः। नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः॥

pibanti nadyaḥ svayameva nāmbhaḥ svayaṃ na khādanti phalāni vṛkṣāḥ । nādanti sasyaṃ khalu vārivāhāḥ paropakārāya satāṃ vibhūtayaḥ ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

मानवता के अनन्य उपासक परम पूज्य डॉ. श्री श्री श्री शिवकुमार स्वामीजी को उनकी जन्म-जयंती पर कोटि-कोटि नमन! शिक्षा, समाज कल्याण और अध्यात्म के क्षेत्र में उनका अतुलनीय योगदान देश की हर पीढ़ी को निस्वार्थ सेवा के लिए प्रेरित करता रहेगा।

पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः का अर्थ

जिस प्रकार नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते और बादल अपने द्वारा उत्पन्न अन्न का स्वयं उपभोग नहीं करते, उसी प्रकार संतों की समस्त संपत्तियाँ और शक्तियाँ अपने लिए नहीं, बल्कि सदैव समाज के कल्याण के लिए समर्पित होती हैं।

शब्दार्थ

पिबन्तिpibanti

पीती हैं

√पा

नद्यःnadyaḥ

नदियाँ

√नद्

स्वयम् एवsvayam eva

स्वयं ही

नna

नहीं

अम्भःambhaḥ

जल

अम्भस्

खादन्तिkhādanti

खाते हैं

√खाद्

फलानिphalāni

फल

फल

वृक्षाःvṛkṣāḥ

वृक्ष

वृक्ष

अदन्तिadanti

भोगते हैं

√अद्

सस्यम्sasyam

अन्न

सस्य

खलुkhalu

निश्चय ही

वारिवाहाःvārivāhāḥ

जल ढोने वाले, मेघ

वारि + √वह्

परोपकारायparopakārāya

परोपकार के लिए

पर + उप + √कृ

सताम्satām

सज्जनों की

सत्, √अस्

विभूतयःvibhūtayaḥ

विभूतियाँ

वि + √भू

व्याख्या

यह श्लोक नदियों, वृक्षों और मेघों के उदाहरण से परोपकार का भाव समझाता है: नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल नहीं खाते और मेघ उस अन्न का भोग नहीं करते जिसे उगने में वे सहायक होते हैं। केवल अंतिम चरण सिद्धांत को सीधे कहता है कि सज्जनों की विभूतियाँ दूसरों के उपकार के लिए होती हैं। ‘विभूतयः’ बहुवचन है, पर केवल इससे ‘हर प्रकार की संपन्नता’ सिद्ध नहीं होती; धन, ज्ञान और शक्ति इसके उपयोगी आधुनिक उदाहरण हैं, पूर्ण शाब्दिक अनुवाद नहीं। शिवकुमार स्वामीजी की जयंती पर साझा किया गया यह श्लोक कायका यानी श्रम और दासोहा यानी सेवा के आदर्शों से स्वाभाविक रूप से जुड़ता है।

मूल पोस्ट

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सुभाषितरत्नभाण्डागारम् से और सुभाषित

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5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

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दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
18 सित॰ 2026
आर्यासप्तशती

स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥

svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

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चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि

निःस्वार्थ सेवा पर और सुभाषित

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9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

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साहसविनम्रतासम्मान
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bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

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स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
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समराङ्गणसूत्रधार

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