पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः। नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः॥
pibanti nadyaḥ svayameva nāmbhaḥ svayaṃ na khādanti phalāni vṛkṣāḥ । nādanti sasyaṃ khalu vārivāhāḥ paropakārāya satāṃ vibhūtayaḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशमानवता के अनन्य उपासक परम पूज्य डॉ. श्री श्री श्री शिवकुमार स्वामीजी को उनकी जन्म-जयंती पर कोटि-कोटि नमन! शिक्षा, समाज कल्याण और अध्यात्म के क्षेत्र में उनका अतुलनीय योगदान देश की हर पीढ़ी को निस्वार्थ सेवा के लिए प्रेरित करता रहेगा।
पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः का अर्थ
जिस प्रकार नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते और बादल अपने द्वारा उत्पन्न अन्न का स्वयं उपभोग नहीं करते, उसी प्रकार संतों की समस्त संपत्तियाँ और शक्तियाँ अपने लिए नहीं, बल्कि सदैव समाज के कल्याण के लिए समर्पित होती हैं।
शब्दार्थ
- पिबन्तिpibanti
पीती हैं
√पा
- नद्यःnadyaḥ
नदियाँ
√नद्
- स्वयम् एवsvayam eva
स्वयं ही
- नna
नहीं
- अम्भःambhaḥ
जल
अम्भस्
- खादन्तिkhādanti
खाते हैं
√खाद्
- फलानिphalāni
फल
फल
- वृक्षाःvṛkṣāḥ
वृक्ष
वृक्ष
- अदन्तिadanti
भोगते हैं
√अद्
- सस्यम्sasyam
अन्न
सस्य
- खलुkhalu
निश्चय ही
- वारिवाहाःvārivāhāḥ
जल ढोने वाले, मेघ
वारि + √वह्
- परोपकारायparopakārāya
परोपकार के लिए
पर + उप + √कृ
- सताम्satām
सज्जनों की
सत्, √अस्
- विभूतयःvibhūtayaḥ
विभूतियाँ
वि + √भू
व्याख्या
यह श्लोक नदियों, वृक्षों और मेघों के उदाहरण से परोपकार का भाव समझाता है: नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल नहीं खाते और मेघ उस अन्न का भोग नहीं करते जिसे उगने में वे सहायक होते हैं। केवल अंतिम चरण सिद्धांत को सीधे कहता है कि सज्जनों की विभूतियाँ दूसरों के उपकार के लिए होती हैं। ‘विभूतयः’ बहुवचन है, पर केवल इससे ‘हर प्रकार की संपन्नता’ सिद्ध नहीं होती; धन, ज्ञान और शक्ति इसके उपयोगी आधुनिक उदाहरण हैं, पूर्ण शाब्दिक अनुवाद नहीं। शिवकुमार स्वामीजी की जयंती पर साझा किया गया यह श्लोक कायका यानी श्रम और दासोहा यानी सेवा के आदर्शों से स्वाभाविक रूप से जुड़ता है।
मूल पोस्ट
सुभाषितरत्नभाण्डागारम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।
निःस्वार्थ सेवा पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।