मनोजवं मारुततुल्यवेगं - श्री हनुमान वंदना

2 अप्रैल 2026

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शिरसा नमामि॥

manojavaṁ mārutatulyavegaṁ jitendriyaṁ buddhimatāṁ variṣṭham । vātātmajaṁ vānarayūthamukhyaṁ śrīrāmadūtaṁ śirasā namāmi ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

भगवान हनुमान जी भक्ति, शक्ति और अटूट समर्पण के अद्वितीय प्रतीक हैं। महाबली की कृपा से उनके सभी भक्तों में साहस और सकारात्मकता का संचार हो।

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं का अर्थ

मैं श्रीराम के दूत हनुमानजी की शरण में शीश झुकाता हूँ। वे मन के समान तीव्रगामी और वायु के समान वेगवान हैं। वे जितेन्द्रिय, बुद्धिमानों में अग्रगण्य, पवनपुत्र और वानर सेना के नायक हैं।

शब्दार्थ

मनोजवम्manojavam

मन के समान वेग वाले

मनस् + जव

मारुततुल्यवेगम्mārutatulyavegam

वायु के तुल्य वेग वाले

मरुत् + तुल्य + वेग

जितेन्द्रियम्jitendriyam

जितेन्द्रिय

√जि + इन्द्रिय

बुद्धिमताम्buddhimatām

बुद्धिमानों में

√बुध्

वरिष्ठम्variṣṭham

श्रेष्ठतम

√वृ

वातात्मजम्vātātmajam

पवनपुत्र

वात + आत्मज

वानरयूथमुख्यम्vānarayūthamukhyam

वानरसेना के मुख्य

वानर + यूथ + मुख्य

श्रीरामदूतम्śrīrāmadūtam

श्रीराम के दूत

राम + दूत

शिरसाśirasā

शिर से

शिरस्

नमामिnamāmi

मैं नमन करता हूँ

√नम्

व्याख्या

यह वंदना अंतिम प्रणाम से पहले हनुमान जी के अनेक नाम और गुण सामने रखती है। मनोजवम् और मारुततुल्यवेगम् उनके अद्भुत वेग का वर्णन करते हैं; जितेन्द्रियम् इंद्रिय-संयम और बुद्धिमतां वरिष्ठम् श्रेष्ठ बुद्धि को बताता है। वातात्मजम्, वानरयूथमुख्यम् और श्रीरामदूतम् क्रमशः उनके वंश, नेतृत्व और सेवा-संबंध को व्यक्त करते हैं। इसलिए ये सभी पद केवल संबंध नहीं हैं: कुछ उनकी क्षमताओं के सीधे वर्णन हैं और कुछ उन्हें वायु, वानर-समुदाय तथा श्रीराम से जोड़ते हैं। अंत का ‘नमामि’ भक्ति को स्पष्ट करता है और शक्ति, बुद्धि तथा संयम को आत्म-प्रदर्शन नहीं, सेवा में समर्पित गुणों के रूप में रखता है।

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भक्ति पर और सुभाषित

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9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
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भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

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स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस