बहुरत्ना वसुन्धरा - अनमोल रत्नों वाली पृथ्वी

16 फ़र॰ 2026

दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये। विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा॥

dāne tapasi śaurye ca vijñāne vinaye naye । vismayo na hi kartavyo bahuratnā vasundharā ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

यह हमारे लिए अत्यंत गर्व की बात है कि India AI Impact Summit के लिए दुनियाभर से लोग भारत आ रहे हैं। इससे हमारे देश के युवाओं के सामर्थ्य का भी पता चलता है। यह अवसर इस बात का भी प्रमाण है कि हमारा देश विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में तेजी से प्रगति कर रहा है और वैश्विक विकास में अहम योगदान दे रहा है।

दाने तपसि शौर्ये च का अर्थ

दान, तप, शौर्य, विज्ञान, विनय और नेतृत्व के संसार में सदैव उत्कृष्ट से उत्कृष्टतर उदाहरण प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि यह पृथ्वी अनेक अनमोल रत्नों से भरी है। अतः विज्ञान व प्रविधि आदि के क्षेत्रों में नित नए आविष्कारों तथा नवाचारों पर किसी को विस्मय नहीं होना चाहिए।

शब्दार्थ

दानेdāne

दान में

√दा

तपसिtapasi

तप में

√तप्

शौर्येśaurye

शौर्य में

√शूर्

चca

और

विज्ञानेvijñāne

विज्ञान में

वि + √ज्ञा

विनयेvinaye

विनय में

वि + √नी

नयेnaye

नीति में

√नी

विस्मयःvismayaḥ

विस्मय, अत्यधिक आश्चर्य

वि + √स्मि

न हि कर्तव्यःna hi kartavyaḥ

कदापि नहीं करना चाहिए

√कृ

बहुरत्नाbahuratnā

बहुत रत्नों वाली

बहु + रत्न

वसुन्धराvasundharā

वसुन्धरा

वसु + √धृ

व्याख्या

यह श्लोक उत्कृष्टता के छह क्षेत्रों—दान, तप, शौर्य, विज्ञान, विनय और नीति—में 'विस्मय', अर्थात अत्यधिक चकित या अभिभूत होने से सावधान करता है। इसका कारण है ‘बहुरत्ना वसुन्धरा’, अर्थात पृथ्वी अनेक रत्नों से भरी है। यहाँ ‘रत्न’ असाधारण व्यक्तियों और गुणों का बिंब है, इसलिए वास्तविक उपलब्धि के साथ भी विनम्रता आवश्यक है; कहीं कोई समान या अधिक श्रेष्ठ व्यक्ति हो सकता है। इस नैतिक सूची में ‘विज्ञान’ व्यापक बोध, विवेक या सिद्ध ज्ञान का अर्थ रखता है; वह अपने आप आधुनिक विज्ञान या तकनीक नहीं बन जाता। India AI Impact Summit के पोस्ट ने इसी शब्द को नवाचार से जोड़ा, पर वह श्लोक के मूल विस्मय-विरोध का समकालीन अनुप्रयोग है। इससे विनम्रता की शिक्षा निकालना उचित व्याख्या है, पर 'विस्मय' का शाब्दिक अर्थ आत्मप्रशंसा नहीं है।

मूल पोस्ट

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चाणक्य नीति से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
17 जुल॰ 2026
चाणक्य नीति

प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥

prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥

चाणक्य नीति का यह श्लोक सिखाता है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे सिंह की तरह पूर्ण समर्पण और पूरे प्रयास से करना चाहिए।

ज्ञानअनुशासनदृढ़ता
18 मई 2026
चाणक्य नीति

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥

jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥

यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।

दृढ़ताविद्याधर्मसमृद्धिअनुशासन
14 मई 2026
चाणक्य नीति

विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥

vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥

यह श्लोक विद्या और विद्वानों की महिमा का गुणगान करता है। ज्ञान से न केवल सम्मान प्राप्त होता है, बल्कि जीवन की समस्त उपलब्धियाँ भी मिलती हैं।

विद्याशिक्षासम्मान

ज्ञान पर और सुभाषित

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9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
8 अक्टू॰ 2026

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।

स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता