अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च। पराक्रमश्च बहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥
aṣṭau guṇāḥ puruṣaṁ dīpayanti prajñā suśīlatva-damau śrutaṁ ca । parākramaś ca bahubhāṣitā ca dānaṁ yathāśakti kṛtajñatā ca ॥
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति का अर्थ
ये आठ गुण मनुष्य के जीवन को प्रकाशमान करते हैं। बुद्धि उसके मार्ग को स्पष्ट करती है। सदाचार उसके आचरण को पवित्र बनाता है और संयम उसे अनुशासित रखता है। ज्ञान उसे विवेक देता है, वीरता कठिन परिस्थितियों में अडिग रखती है और वाणी की कुशलता उसे समाज में सम्मान दिलाती है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करना और उपकारों के प्रति कृतज्ञ रहना उसके व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करते हैं।
शब्दार्थ
- अष्टौaṣṭau
आठ
अष्टन्
- गुणाःguṇāḥ
गुण
गुण
- पुरुषम्puruṣam
पुरुष को
पुरुष
- दीपयन्तिdīpayanti
प्रकाशित करते हैं
√दीप्
- प्रज्ञाprajñā
प्रज्ञा
प्र + √ज्ञा
- सुशीलत्वदमौsuśīlatvadamau
सुशीलता और दम
सु + शील + √दम्
- श्रुतम्śrutam
श्रुत
√श्रु
- पराक्रमःparākramaḥ
पराक्रम
परा + √क्रम्
- बहुभाषिताbahubhāṣitā
बहुत बोलना, वाचालता
बहु + √भाष्
- दानम्dānam
दान
√दा
- यथाशक्तिyathāśakti
सामर्थ्य के अनुसार
यथा + शक्ति
- कृतज्ञताkṛtajñatā
कृतज्ञता
√कृ + √ज्ञा
व्याख्या
यह श्लोक कहता है कि आठ गुण मनुष्य को प्रकाशित और सुशोभित करते हैं। प्रस्तुत पाठ में प्रज्ञा, सुशीलत्व, दम, श्रुतम्, पराक्रम, यथाशक्ति दान और कृतज्ञता क्रमशः बुद्धि, सदाचार, आत्मसंयम, ज्ञान, साहस, सामर्थ्यानुसार उदारता और उपकार-स्मरण को स्पष्ट रूप से व्यक्त करते हैं। इसमें आया 'बहुभाषिता' शब्द शाब्दिक रूप से अधिक बोलने या वाचालता का अर्थ देता है; इसका अर्थ वाणी की कुशलता नहीं है। महाभारत के स्थापित पाठ में इसके स्थान पर 'अबहुभाषिता', अर्थात मितभाषिता, और 'सुशीलत्वदमौ' के स्थान पर 'कौल्यं च दमः', अर्थात कुलीनता और आत्मसंयम, मिलता है। इस पाठभेद को स्पष्ट रखते हुए श्लोक की शिक्षा बुद्धि और अनुशासित आचरण को साहस, उदारता, कृतज्ञता और संयमित अभिव्यक्ति से जोड़ती है।
मूल पोस्ट
विदुर नीति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
ज्ञान पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।