चरन् वै मधु विन्दति - गतिशील का सौभाग्य

13 फ़र॰ 2026

चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम्। सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति॥

caran vai madhu vindati caran svādum udumbaram । sūryasya paśya śremāṇaṃ yo na tandrayate caraṃś caraiveti ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

भगवान सूर्य हम सबके जीवन में ऊर्जा और उत्साह का संचार करते हैं। आज के दिन शुरू हुई पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना भी उन्हीं से रोशन है। यह देशवासियों को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने के लिए निरंतर प्रेरित कर रही है।

चरन् वै मधु विन्दति का अर्थ

चलते हुए को अर्थात् क्रियाशील व्यक्ति को ही संसार में उत्तम वस्तुओं की प्राप्ति होती, जैसे निरंतर गतिमान सूर्य को श्रेय की प्राप्ति होती। अतः हमेशा क्रियाशील रहना चाहिए।

शब्दार्थ

चरन्caran

चलता हुआ

√चर्

वैvai

निश्चय ही

मधुmadhu

मधु

मधु

विन्दतिvindati

पाता है

√विद्

स्वादुम्svādum

स्वादु

स्वादु

उदुम्बरम्udumbaram

उदुम्बर फल

उदुम्बर

सूर्यस्यsūryasya

सूर्य की

सूर्य

पश्यpaśya

देखो

√दृश्

श्रेमाणम्śremāṇam

महिमा

श्री

यःyaḥ

जो

यद्

न तन्द्रयतेna tandrayate

आलस्य नहीं करता

√तन्द्र्

चरन् चर एव इतिcaraṃś caraiveti

चलते हुए—चरते रहो

√चर्

व्याख्या

प्रसिद्ध 'चरैवेति' श्रृंखला का हिस्सा, यह श्लोक निरंतर कर्म (चरत्व) के पुरस्कारों पर प्रकाश डालता है। यह दो सुंदर रूपकों का उपयोग करता है: मीठा शहद खोजने वाला यात्री और अपनी सर्वोच्च महिमा प्राप्त करने वाला सूर्य। जिस प्रकार सूर्य अपनी यात्रा से कभी नहीं थकता और समस्त जीवन का पोषण करता है, उसी प्रकार जो व्यक्ति आलस्य को त्याग कर 'सक्रिय' रहता है, वह श्रम के सबसे मीठे फल प्राप्त करता है। यह सिखाता है कि भाग्य उन्हीं का होता है जो चलते हैं। ठहराव क्षय है, बल्कि गति जीवन है। सूर्य को परम 'कर्मयोगी' के रूप में प्रस्तुत किया गया है—सदैव गतिशील, सदैव देने वाला और कभी न थकने वाला। साझा अर्थ 'श्रेमाणम्' को श्रेय की प्राप्ति कहता है, जबकि यहाँ यह सूर्य की अपनी महिमा है, और पंक्ति का बल 'यो न तन्द्रयते' अर्थात् वह आलस्य नहीं करता, पर है। मधु और स्वादु उदुम्बर—चलने पर मिलने वाले ये मूर्त फल भी मूल पाठ की विशेषता हैं।

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ऐतरेय ब्राह्मण से और सुभाषित

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2 जुल॰ 2026
ऐतरेय ब्राह्मण

नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम। पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति॥

nānāśrāntāya śrīr astīti rohita śuśruma । pāpo nṛṣadvaro jana indra ic carataḥ sakhā caraiveti ॥

ऐतरेय ब्राह्मण की चरैवेति परंपरा का यह मंत्र बताता है कि समृद्धि निरंतर प्रयत्न करने वाले को मिलती है, निष्क्रिय रहने वाले को नहीं।

दृढ़ताअनुशासनसफलताकर्म
21 जन॰ 2026
ऐतरेय ब्राह्मण

चरैवेति चरैवेति चरन्वै मधु विन्दति। सूर्यास्य पश्य श्रेमाणं न मामार न जीर्यति॥

caraiveti caraiveti caranvai madhu vindati । sūryāsya paśya śremāṇaṃ na māmāra na jīryati ॥

वैदिक उद्घोष ‘चरैवेति’ सूर्य की अविराम गति से प्रेरणा लेकर सतत कर्म को प्रगति का मार्ग बताता है।

दृढ़ताअनुशासनज्ञान

दृढ़ता पर और सुभाषित

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7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता