प्रथमवयसि पीतं तोयमल्पं - उपकार का स्मरण

21 अक्टू॰ 2026

प्रथमवयसि पीतं तोयमल्पं स्मरन्तः शिरसि निहितभारा नारिकेला नराणाम्। ददति जलमनल्पास्वादमाजीवितान्तं न हि कृतमुपकारं साधवो विस्मरन्ति॥

prathamavayasi pītaṃ toyamalpaṃ smarantaḥ śirasi nihitabhārā nārikelā narāṇām । dadati jalamanalpāsvādamājīvitāntaṃ na hi kṛtamupakāraṃ sādhavo vismaranti ॥

प्रथमवयसि पीतं तोयमल्पं स्मरन्तः का अर्थ

जिस प्रकार नारियल का वृक्ष अपने प्रारम्भिक अवस्था में प्राप्त थोड़े से जल के उपकार को जीवन भर स्मरण रखता है और अपने सिर पर भार सहते हुए भी मनुष्यों को मधुर जल प्रदान करता रहता है, उसी प्रकार सच्चे उदात्त व्यक्ति—विशेषतः बलिदानी महापुरुषों के प्रति—किए गए उपकार को कभी नहीं भूलते। वे उनके त्याग, तप और समर्पण के प्रति गहन कृतज्ञता रखते हुए, अपने जीवन को उनके आदर्शों के अनुरूप समर्पित कर, उस उपकार के प्रति सदा कृतज्ञ रहा करते हैं।

अनुवाद टिप्पणी: यह अनुवाद प्रधानमंत्री के X पोस्ट के वीडियो से यथावत लिया गया है। बलिदानी महापुरुषों, उनके त्याग, तप, समर्पण और आदर्शों के अनुरूप जीवन बिताने का उल्लेख अतिरिक्त है; संस्कृत में सामान्य रूप से सज्जनों के उपकार न भूलने की बात है।

शब्दार्थ

प्रथमवयसिprathamavayasi

आरम्भिक अवस्था में

पीतंpītaṃ

पिया हुआ

तोयमल्पंtoyamalpaṃ

थोड़ा जल, तोयम् + अल्पम्

स्मरन्तःsmarantaḥ

स्मरण करते हुए

शिरसिśirasi

सिर पर

निहितभाराnihitabhārā

भार धारण किए हुए; सन्धि में निहितभाराः

नारिकेलाnārikelā

नारियल के वृक्ष; सन्धि में नारिकेलाः

नराणाम्narāṇām

मनुष्यों के लिए

ददतिdadati

देते हैं

जलमनल्पास्वादमाजीवितान्तंjalamanalpāsvādamājīvitāntaṃ

जीवन के अन्त तक अत्यन्त स्वादिष्ट जल; जलम् + अनल्पास्वादम् + आजीवितान्तम्

नna

नहीं

हिhi

निश्चय ही; क्योंकि

कृतमुपकारंkṛtamupakāraṃ

किया गया उपकार; कृतम् + उपकारम्

साधवोsādhavo

सज्जन; सन्धि में साधवः

विस्मरन्तिvismaranti

भूलते हैं

व्याख्या

इस श्लोक में नारियल के वृक्ष की कल्पना ऐसे प्राणी के रूप में की गई है जिसे अपने बचपन में पिया हुआ थोड़ा जल याद है। अब उसके सिर पर फलों का भार है, फिर भी वह जीवन भर मनुष्यों को मधुर जल देता है। अल्प जल और अनल्पास्वाद अर्थात् भरपूर मिठास वाले जल का अन्तर बताता है कि आरम्भ में मिली छोटी सहायता का महत्त्व भी बहुत बड़ा हो सकता है। अन्तिम चरण इसी चित्र के माध्यम से साधवः अर्थात् सज्जनों का स्वभाव बताता है, वे अपने प्रति किया गया उपकार नहीं भूलते। आज के जीवन में यह कृतज्ञता उन लोगों की निरन्तर सुध लेने में व्यक्त हो सकती है जिन्होंने कठिन समय में हमारी सहायता की थी।

शार्ङ्गधर पद्धति से और सुभाषित

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शार्ङ्गधर पद्धति

खद्योतो द्योतते तावद् यावन्नोदयते शशी। उदिते तु सहस्रांशौ न खद्योतो न चन्द्रमाः॥

khadyoto dyotate tāvad yāvannodayate śaśī। udite tu sahasrāṃśau na khadyoto na candramāḥ॥

जुगनू चन्द्रमा के उदय तक चमकता है; सूर्य के उदय पर दोनों का प्रकाश फीका पड़ जाता है। श्लोक अधिक तेज के सामने छोटे प्रकाश की स्थिति दिखाता है।

प्रकृतिशक्ति
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति

चरित्र पर और सुभाषित

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शार्ङ्गधर पद्धति

खद्योतो द्योतते तावद् यावन्नोदयते शशी। उदिते तु सहस्रांशौ न खद्योतो न चन्द्रमाः॥

khadyoto dyotate tāvad yāvannodayate śaśī। udite tu sahasrāṃśau na khadyoto na candramāḥ॥

जुगनू चन्द्रमा के उदय तक चमकता है; सूर्य के उदय पर दोनों का प्रकाश फीका पड़ जाता है। श्लोक अधिक तेज के सामने छोटे प्रकाश की स्थिति दिखाता है।

प्रकृतिशक्ति
वाल्मीकि रामायण

रामो विग्रहवान् धर्मस्साधुस्सत्यपराक्रमः। राजा सर्वस्य लोकस्य देवानां मघवानिव॥

rāmo vigrahavān dharmassādhussatyaparākramaḥ । rājā sarvasya lokasya devānāṃ maghavāniva ॥

श्रीराम धर्म, साधुता और सत्य पराक्रम के मूर्त रूप हैं। समस्त लोक के राजा के रूप में उनकी तुलना देवराज इन्द्र से की गई है।

धर्मचरित्रसाहसनेतृत्व
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता