विक्रमचरितम् से सुभाषित
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नवीनतम अद्यतन: 29 सित॰ 2026
संबंधित मार्गदर्शिकाएँ और श्लोक चयन
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
16 जून 2026
किरातार्जुनीयम्
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्। वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥
sahasā vidadhīta na kriyām avivekaḥ paramāpadāṃ padam । vṛṇate hi vimṛśyakāriṇaṃ guṇalubdhāḥ svayameva sampadaḥ ॥
भारवि के किरातार्जुनीयम् का यह श्लोक उतावलेपन से बचने और विवेकपूर्ण निर्णयों द्वारा सफलता व समृद्धि प्राप्त करने की शिक्षा देता है।
ज्ञानअनुशासनसफलताचरित्र
27 अप्रैल 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्
छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव॥
chāyāmanyasya kurvanti tiṣṭhanti svayamātape । phalānyapi parārthāya vṛkṣāḥ satpuruṣā iva ॥
यह श्लोक वृक्षों की तुलना सज्जन पुरुषों से करता है, जो स्वयं कष्ट सहकर दूसरों का कल्याण करते हैं।
निःस्वार्थ सेवानैतिकताचरित्र