सूक्तिरत्नहारः से सुभाषित

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नवीनतम अद्यतन: 16 सित॰ 2026

संबंधित मार्गदर्शिकाएँ और श्लोक चयन

सुभाषित क्या है?
सुभाषित सुन्दर और सार्थक ढंग से कही गई स्मरणीय संस्कृत उक्ति है—प्रायः ऐसा स्वतंत्र पद्य जो ज्ञान, सलाह, अनुभव या किसी पूर्ण विचार को व्यक्त करता है।
अर्थ सहित संस्कृत श्लोक
संस्कृत ज्ञान का विचारपूर्वक चुना गया परिचय—देवनागरी पाठ, IAST लिप्यंतरण, हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ, स्रोत और विस्तृत व्याख्या सहित।
विद्यार्थियों के लिए संस्कृत श्लोक
विद्या, ध्यानपूर्वक श्रवण, गुरु, तर्क, स्मृति, अनुशासन और क्रमिक प्रगति पर विद्यार्थियों के लिए श्लोक।
जीवन पर संस्कृत श्लोक
विवेकपूर्ण कर्म, सत्य, चरित्र, संबंध, आत्मसंयम और श्रेष्ठ जीवन को आकार देने वाले दैनिक निर्णयों पर संस्कृत श्लोक।
16 सित॰ 2026
महाभारत

अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥

advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥

महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।

साहसज्ञानदृढ़तासमृद्धि
12 अग॰ 2026
विदुर नीति

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्। प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति॥

cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham । prasādayati yo lokaṁ taṁ loko'nuprasīdati ॥

विदुर नीति सिखाती है कि जो व्यक्ति दृष्टि, विचार, वाणी और कर्म से लोगों को प्रसन्न करता है, उसे लोगों का सद्भाव भी प्राप्त होता है।

सामंजस्यकर्म
4 मई 2026
चाणक्य नीति

को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्। को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम्॥

ko hi bhāraḥ samarthānāṁ kiṁ dūraṁ vyavasāyinām । ko videśaḥ suvidyānāṁ kaḥ paraḥ priyavādinām ॥

यह श्लोक बताता है कि कैसे कौशल, परिश्रम, शिक्षा और मधुर वाणी सफलता और अपनेपन की सभी बाधाओं को दूर कर देते हैं।

सामर्थ्यशिक्षादृढ़ताचरित्र
31 मार्च 2026
पञ्चतन्त्र

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥

śrūyatāṃ dharmasarvasvaṃ śrutvā caivāvadhāryatām । ātmanaḥ pratikūlāni pareṣāṃ na samācaret ॥

यह सुभाषित धर्म के समस्त सार को एक सुवर्ण नियम में समेटता है — जो व्यवहार अपने लिए अनुचित लगे, वह दूसरों के साथ कभी न करें।

नैतिकताधर्मचरित्र
17 फ़र॰ 2026
कामन्दकीय नीतिसार

शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणां तथा। ऊहापोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः॥

śuśrūṣā śravaṇaṃ caiva grahaṇaṃ dhāraṇāṃ tathā । ūhāpoho’rthavijñānaṃ tattvajñānaṃ ca dhīguṇāḥ ॥

परिपक्व बुद्धि उत्सुकता से सुनती, अर्थ ग्रहण और धारण करती, तर्कपूर्वक विचार करती, भ्रम त्यागती और सत्य पहचानती है।

विद्याशिक्षाअनुशासन