अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा। अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत्प्रशस्यते॥
adrohaḥ sarvabhūteṣu karmaṇā manasā girā । anugrahaśca dānaṁ ca śīlametatpraśasyate ॥
प्रधानमंत्री का संदेशनिस्वार्थ भाव से किया गया कर्म ही सच्ची मानवता है। इससे आत्मिक खुशी तो मिलती ही है, समाज का भी कल्याण होता है।
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा का अर्थ
मन, वचन और कर्म से सभी प्राणियों के प्रति द्वेष न रखना, उन पर दया करना और दान देना - यही श्रेष्ठ आचरण माना गया है।
शब्दार्थ
- अद्रोहःadrohaḥ
द्रोह का अभाव
अ + √द्रुह्
नञ् समास—द्रोह का दमन नहीं, अभाव।
- सर्वभूतेषुsarvabhūteṣu
समस्त प्राणियों के प्रति
सर्व + भूत
- कर्मणाkarmaṇā
कर्म से
कर्मन्, √कृ
- मनसाmanasā
मन से
मनस्
- गिराgirā
वाणी से
गिर्, √गॄ
- अनुग्रहःanugrahaḥ
अनुग्रह, कृपा
अनु + √ग्रह्
- चca
और
च
- दानम्dānam
दान
√दा
- शीलम्śīlam
शील, आचरण
शील
- एतत्etat
यह
एतद्
- प्रशस्यतेpraśasyate
प्रशंसित होता है
प्र + √शंस्
'प्रशंसित' कहा गया है, 'सर्वोच्च' नहीं।
व्याख्या
महाभारत के शांति पर्व से लिया गया यह श्लोक प्रशंसनीय मानव आचरण (शील) के मानक को रेखांकित करता है। यह तीन मुख्य सद्गुणों पर प्रकाश डालता है: 'अद्रोह' अर्थात् मन, वचन और कर्म से किसी भी प्राणी के प्रति द्वेष न रखना; 'अनुग्रह' अर्थात् सभी पर दया करना; और 'दान' अर्थात् निस्वार्थ भाव से देना। ये तीनों मिलकर एक धर्मपरायण जीवन की नींव बनाते हैं। यह सिखाता है कि सच्ची आध्यात्मिक तृप्ति इस बात से आती है कि हम अपने आस-पास के संसार और प्राणियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। तीनों का क्रम ही तर्क है। 'अद्रोह' पहले आता है और वह निषेधात्मक है—हानि का हटाया जाना—और तभी 'अनुग्रह' तथा 'दान' आते हैं, जो हित जोड़ते हैं। आचरण इसी क्रम में बनता है, विपरीत क्रम में नहीं; अतः जिसने पहले द्रोह नहीं छोड़ा उसका दान इस वर्णित मानक तक नहीं पहुँचता। करण-त्रयी—कर्म, मन और वाणी—परम्परा में निश्चित है; यहाँ केवल वाणी का शब्द छन्द के कारण 'गिर्' हो गया है।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
महाभारत से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
नैतिकता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।