भस्मीकृत स्वार्थ सौख्य - स्वराज्य के वीर साधक

8 अक्टू॰ 2026

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः का अर्थ

जिन्होंने अपने निजी सुख का त्याग किया और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को स्वराज्य की साधना में समर्पित कर दिया, वही वीर साधक वास्तव में राष्ट्र के लिए धन्य माने जाते हैं।

शब्दार्थ

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाःbhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ

जिनके शरीर अपने निजी सुख को भस्म करके बनी राख से लिप्त हैं

समास में भस्मीकृत का अर्थ राख किया हुआ, स्वार्थसौख्य का निजी सुख, परिचर्चित का लिप्त और विग्रह का शरीर है। यह निजी सुख के त्याग की काव्यात्मक छवि है।

स्वराज्ययोगनिर्मग्नाsvarājyayoganirmagnā

स्वराज्य की साधना में पूरी तरह निमग्न

स्वराज्य अर्थात् अपना शासन, योग अर्थात् यहाँ समर्पित साधना और निर्मग्न अर्थात् पूरी तरह डूबे हुए। धन्याः से पहले निर्मग्नाः का विसर्ग लुप्त होकर निर्मग्ना बनता है।

धन्याःdhanyāḥ

धन्य, प्रशंसा के योग्य

धन्याः + ते की सन्धि से धन्यास्ते बनता है।

तेte

वे

तद् का प्रथमा बहुवचन, जो वीर साधकों को इंगित करता है।

वीरयोगिनःvīrayoginaḥ

वीर योगी या साहसी साधक

वीर और योगिन् से बना समास, प्रथमा बहुवचन। यहाँ स्वराज्य की साधना करने वाले वीर व्यक्तियों का उल्लेख है।

व्याख्या

पहली पंक्ति में निजी सुख को भस्म करके उसकी राख शरीर पर लगाने की कल्पना है। तपस्वी की भस्मधारी देह जैसी यह छवि त्याग को एक दिखाई देने वाला रूप देती है। 'स्वार्थसौख्य' अपने लिए चाहे गए सुख को कहता है, जबकि 'स्वराज्ययोगनिर्मग्न' स्वराज्य की साधना में पूरी तरह डूब जाने का भाव व्यक्त करता है। 'वीरयोगिनः' में वीर का साहस और योगी की एकाग्र साधना एक साथ आते हैं। 'धन्याः' ऐसे त्याग की प्रशंसा है, किसी भौतिक पुरस्कार का आश्वासन नहीं। आज का पाठक इस श्लोक के सहारे विचार कर सकता है कि अपने समुदाय की स्वतंत्रता के लिए वह किन निजी सुविधाओं का त्याग करने को तैयार है।

मूल पोस्ट

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स्वतंत्रता पर और सुभाषित

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9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस