श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
śvete vṛṣe samārūḍhā śvetāmbaradharā śuciḥ । mahāgaurī śubhaṁ dadyān mahādevapramodadā ॥
प्रधानमंत्री का संदेशमां महागौरी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम! उनकी दिव्य आभा हर किसी के जीवन में सुख-समृद्धि और आरोग्य लेकर आए।
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा का अर्थ
श्वेत वृषभ पर सवार, सफेद वस्त्र धारण करने वाली, अत्यंत पवित्र और महादेव को प्रसन्न करने वाली माँ महागौरी मुझे शुभ आशीर्वाद प्रदान करें।
शब्दार्थ
- श्वेते वृषेśvete vṛṣe
श्वेत वृषभ पर
श्वेत + वृष
- समारूढाsamārūḍhā
आरूढ़
सम् + आ + √रुह्
- श्वेताम्बरधराśvetāmbaradharā
श्वेत वस्त्र धारण किए
श्वेत + अम्बर + √धृ
- शुचिःśuciḥ
पवित्र
√शुच्
- महागौरीmahāgaurī
महागौरी
महा + गौर
- शुभम् दद्यात्śubhaṁ dadyāt
शुभ प्रदान करें
√शुभ् + √दा
- महादेवप्रमोददाmahādevapramodadā
महादेव को आनन्द देने वाली
महादेव + प्र + √मुद् + √दा
व्याख्या
यह ध्यान श्लोक नवदुर्गा के आठवें स्वरूप महागौरी को श्वेत वृषभ पर आरूढ़, श्वेत वस्त्रधारिणी और पवित्र बताता है। श्वेतता वृषभ और वस्त्र के लिए कही गई है, जबकि 'शुचिः' उससे सम्बद्ध पर भिन्न गुण, पवित्रता, जोड़ता है। श्लोक में त्रिशूल, डमरू, हस्तमुद्राएँ, रक्षा या वरदान-मुद्रा का उल्लेख नहीं है; वे व्यापक मूर्तिशास्त्रीय परम्परा के अंग हैं। प्रार्थना केवल यह है कि महागौरी शुभ प्रदान करें। 'महादेवप्रमोददा' उन्हें महादेव को आनन्द देने वाली बताता है।
मूल पोस्ट
नवदुर्गा स्तोत्रम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
siddhagandharvayakṣādyairasurairamarairapi । sevyamānā sadā bhūyāt siddhidā siddhidāyinī ॥
नवदुर्गा के नौवें स्वरूप माँ सिद्धिदात्री की स्तुति, जो सभी सिद्धियों और शक्तियों को प्रदान करने वाली हैं।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
vāmapādollasallohalatākaṇṭakabhūṣaṇā । vardhanmūrdhadhvajā kṛṣṇā kālarātrirbhayaṅkarī ॥
नवदुर्गा स्तोत्र का यह श्लोक माँ कालरात्रि के भयंकर किंतु मंगलकारी स्वरूप का वर्णन करता है, जो अंधकार और भय का नाश करने वाली हैं।
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥
candrahāsojjvalakarā śārdūlavaravāhanā । kātyāyanī śubhaṁ dadyād devī dānavaghātinī ॥
चन्द्रहास खड्ग धारण करने वाली और सिंह पर सवार माँ कात्यायनी की वंदना, जो शुभ फल और शक्ति प्रदान करती हैं।
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।