वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
vāmapādollasallohalatākaṇṭakabhūṣaṇā । vardhanmūrdhadhvajā kṛṣṇā kālarātrirbhayaṅkarī ॥
प्रधानमंत्री का संदेशमां कालरात्रि को नमन! उनके आशीष से सबका जीवन साहस, संकल्प और सफलता से समृद्ध हो यही कामना है।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा का अर्थ
जिनके बाएं पैर में लोहे की कांटों जैसी लता शोभा पा रही है। जो अपने सिर पर गौरवशाली ध्वजा धारण किए हुए हैं। श्याम वर्ण वाली, काल का नाश करने वाली और अत्यंत भयंकर रूप धारण करने वाली हे माँ कालरात्रि! आपको नमस्कार है।
शब्दार्थ
- वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणाvāmapādollasallohalatākaṇṭakabhūṣaṇā
बाएँ चरण पर चमकती लौह-कण्टक लता से भूषित
वाम + पाद + उद् + √लस् + लोह + लता + कण्टक + भूषण
- वर्धन्मूर्धध्वजाvardhanmūrdhadhvajā
सिर पर उठती ध्वजा वाली
√वृध् + मूर्धन् + ध्वज
- कृष्णाkṛṣṇā
श्यामवर्णा
√कृष्
- कालरात्रिःkālarātriḥ
कालरात्रि
काल + रात्रि
- भयङ्करीbhayaṅkarī
भयंकर
√भी + √कृ
व्याख्या
माँ कालरात्रि नवदुर्गा का सातवां स्वरूप हैं, जिनकी पूजा नवरात्रि के सातवें दिन की जाती है। 'कालरात्रि' नाम का अर्थ है—समय का विनाश करने वाली या अंधकार को दूर करने वाली। यह श्लोक उनके स्वरूप का चित्रण करता है, जो बाहर से अत्यंत भयंकर है लेकिन अपने भक्तों के लिए वह अत्यंत शुभ फल देने वाली (शुभंकरी) हैं। उनके बाएं पैर का आभूषण उनकी निरंतर तत्परता और शक्ति का प्रतीक है। माँ का यह रूप हमें सिखाता है कि बुराई और अज्ञानता के विरुद्ध संघर्ष में अत्यंत साहस और संकल्प की आवश्यकता होती है। 'कालरात्रि' वर्णन नहीं, नाम है, जो 'काल' और 'रात्रि' से बना है, और श्लोक उसे कोमल बनाने का कोई प्रयत्न नहीं करता—'कृष्णा', 'भयङ्करी', बाएँ चरण का लौह-कण्टक। ध्यान देने योग्य यह है कि स्तोत्र का समापन-सूत्र उनके लिए बदलता नहीं। उग्र और सौम्य स्वरूप एक ही ढाँचे में सम्बोधित होते हैं और उनसे एक ही वस्तु माँगी जाती है—अतः भय भी माता का ही एक स्वरूप माना गया है, उनसे कोई विचलन नहीं।
मूल पोस्ट
नवदुर्गा स्तोत्रम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
siddhagandharvayakṣādyairasurairamarairapi । sevyamānā sadā bhūyāt siddhidā siddhidāyinī ॥
नवदुर्गा के नौवें स्वरूप माँ सिद्धिदात्री की स्तुति, जो सभी सिद्धियों और शक्तियों को प्रदान करने वाली हैं।
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
śvete vṛṣe samārūḍhā śvetāmbaradharā śuciḥ । mahāgaurī śubhaṁ dadyān mahādevapramodadā ॥
नवदुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की स्तुति, जो पवित्रता और शांति की प्रतीक हैं।
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥
candrahāsojjvalakarā śārdūlavaravāhanā । kātyāyanī śubhaṁ dadyād devī dānavaghātinī ॥
चन्द्रहास खड्ग धारण करने वाली और सिंह पर सवार माँ कात्यायनी की वंदना, जो शुभ फल और शक्ति प्रदान करती हैं।
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।