चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥
candrahāsojjvalakarā śārdūlavaravāhanā । kātyāyanī śubhaṁ dadyād devī dānavaghātinī ॥
प्रधानमंत्री का संदेशमां कात्यायनी को वंदन! दिव्यता और पराक्रम की अधिष्ठात्री देवी मां की कृपा से उनके सभी भक्तों में अपार शक्ति और आत्मविश्वास का संचार हो।
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना का अर्थ
चंद्रहास की चमक से युक्त हाथों वाली, श्रेष्ठ सिंह पर सवारी करने वाली, दानवों का नाश करने वाली माँ कात्यायनी मुझे शुभ फल प्रदान करें।
शब्दार्थ
- चन्द्रहासोज्ज्वलकराcandrahāsojjvalakarā
चन्द्रहास से उज्ज्वल हाथ वाली
चन्द्रहास + उद् + √ज्वल् + कर
- शार्दूलवरवाहनाśārdūlavaravāhanā
श्रेष्ठ व्याघ्र पर सवार
शार्दूल + वर + √वह्
'शार्दूल' का शाब्दिक अर्थ व्याघ्र है।
- कात्यायनीkātyāyanī
कात्यायनी
- शुभम्śubham
शुभ
√शुभ्
- दद्यात्dadyāt
प्रदान करें
√दा
- देवीdevī
देवी
√दिव्
- दानवघातिनीdānavaghātinī
दानवों का नाश करने वाली
दानव + √हन्
व्याख्या
यह ध्यान श्लोक नवदुर्गा के छठे स्वरूप माँ कात्यायनी का तेजस्वी और युद्ध-सज्जित रूप सामने रखता है। उनके हाथ का चमकता खड्ग और उनका व्याघ्र-वाहन साहस, शक्ति तथा विनाशकारी प्रवृत्तियों का सामना करने की तत्परता व्यक्त करते हैं। ‘चन्द्रहास’ अर्थात चन्द्रमा-सा उज्ज्वल खड्ग इस शक्ति में शांत प्रकाश भी जोड़ता है—दैवी सामर्थ्य अनियंत्रित नहीं, उद्देश्यपूर्ण है। भक्त के लिए देवी भय, भ्रम और अन्याय को काटने वाले संकल्प का प्रतीक हैं। यह प्रार्थना उस रक्षक शक्ति से मंगल की कामना करती है जिसमें स्पष्टता और निर्भीक कर्म एक साथ उपस्थित हैं। एक विवरण स्पष्ट रखने योग्य है। 'शार्दूल' का अर्थ व्याघ्र है, अतः 'शार्दूलवरवाहना' उन्हें श्रेष्ठ व्याघ्र का वाहन देती है, यद्यपि प्रतिमाविज्ञान और अधिकांश हिन्दी अनुवाद कात्यायनी को सिंह पर दिखाते हैं। श्लोक उनके अस्त्र का नाम उनके कर्म से पहले लेता है—पहले चन्द्रमा-सी उज्ज्वल चन्द्रहास, और 'दानवघातिनी' अन्त में—अतः असि की शान्त कान्ति उसके प्रयोजन से पूर्व स्थापित हो जाती है।
मूल पोस्ट
नवदुर्गा स्तोत्रम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
siddhagandharvayakṣādyairasurairamarairapi । sevyamānā sadā bhūyāt siddhidā siddhidāyinī ॥
नवदुर्गा के नौवें स्वरूप माँ सिद्धिदात्री की स्तुति, जो सभी सिद्धियों और शक्तियों को प्रदान करने वाली हैं।
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
śvete vṛṣe samārūḍhā śvetāmbaradharā śuciḥ । mahāgaurī śubhaṁ dadyān mahādevapramodadā ॥
नवदुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की स्तुति, जो पवित्रता और शांति की प्रतीक हैं।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
vāmapādollasallohalatākaṇṭakabhūṣaṇā । vardhanmūrdhadhvajā kṛṣṇā kālarātrirbhayaṅkarī ॥
नवदुर्गा स्तोत्र का यह श्लोक माँ कालरात्रि के भयंकर किंतु मंगलकारी स्वरूप का वर्णन करता है, जो अंधकार और भय का नाश करने वाली हैं।
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंउद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥
anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥
विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।