यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते। ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥
yaistu bhaktyā smṛtā nūnaṃ teṣāṃ vṛddhiḥ prajāyate । ye tvāṃ smaranti deveśi rakṣase tānna saṃśayaḥ ॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं का अर्थ
जो भक्त भक्तिपूर्वक देवी दुर्गा का स्मरण करते हैं, उनकी निश्चय ही उन्नति और वृद्धि होती है। हे देवेश्वरी! जो आपका चिंतन करते हैं, आप उनकी संकटों से रक्षा करती हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।
अनुवाद टिप्पणी: यह अनुवाद प्रधानमंत्री के X पोस्ट के वीडियो से ज्यों का त्यों लिया गया है। उद्धृत संस्कृत में देवी द्वारा स्मरण करने वालों की रक्षा का कथन है; उसमें "संकटों से" स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है।
शब्दार्थ
- यैस्तुyaistu
जिनके द्वारा; तो
यैः + तु की सन्धि।
- भक्त्याbhaktyā
भक्ति से
- स्मृताsmṛtā
स्मरण की गईं, देवी के लिए
- नूनंnūnaṃ
निश्चय ही
- तेषांteṣāṃ
उनकी
- वृद्धिःvṛddhiḥ
वृद्धि; उन्नति
- प्रजायतेprajāyate
होती है; उत्पन्न होती है
- येye
जो
- त्वांtvāṃ
आपको
- स्मरन्तिsmaranti
स्मरण करते हैं
- देवेशिdeveśi
हे देवताओं की ईश्वरी
- रक्षसेrakṣase
आप रक्षा करती हैं
- तान्नtānna
उनको; नहीं, तान् + न की सन्धि
- संशयःsaṃśayaḥ
संदेह
व्याख्या
यह श्लोक देवी के स्मरण को भक्त की वृद्धि और रक्षा से जोड़ता है। 'भक्त्या' स्मरण में निहित भक्ति को बताता है और 'वृद्धिः' उस उन्नति का बोध कराता है जो भक्तों के जीवन में होती है। दूसरी पंक्ति में देवी को सीधे 'देवेशि', अर्थात् देवताओं की ईश्वरी कहकर सम्बोधित किया गया है। अन्त में 'न संशयः' कहकर उपासक उनकी रक्षा के प्रति अपना दृढ़ विश्वास प्रकट करता है। दैनिक प्रार्थना में ऐसा स्मरण भक्त को अनिश्चित परिस्थितियों में भी भरोसा बनाए रखने का सहारा दे सकता है।
मूल पोस्ट
देवी महात्म्यम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंया देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
yā devī sarvabhūteṣu śakti-rūpeṇa saṃsthitā । namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान देवी को बारंबार नमन करती है।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
sarvamaṅgalamāṅgalye śive sarvārthasādhike । śaraṇye tryambake gauri nārāyaṇi namo’stu te ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना शरण देने वाली और समस्त उद्देश्यों को सिद्ध करने वाली मंगलमयी नारायणी को नमन करती है।
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया। सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥
tvaṃ vaiṣṇavī śaktiranantavīryā viśvasya bījaṃ paramāsi māyā । sammohitaṃ devi samastametat tvaṃ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ ॥
देवी महात्म्यम् का यह श्लोक देवी को विश्व का मूल कारण और अपनी कृपा से मुक्ति देने वाली शक्ति के रूप में स्तुति करता है।
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंतव च का किल न स्तुतिरम्बिके! सकलशब्दमयी किल ते तनुः। निखिलमूर्तिषु मे भवदन्वयो मनसिजासु बहिःप्रसरासु च॥
tava ca kā kila na stutirambike! sakalaśabdamayī kila te tanuḥ । nikhilamūrtiṣu me bhavadanvayo manasijāsu bahiḥprasarāsu ca ॥
अम्बिका की यह स्तुति समस्त शब्दों, मन में उठने वाले रूपों और बाहरी जगत में देवी की व्याप्ति देखती है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
yā devī sarvabhūteṣu śakti-rūpeṇa saṃsthitā । namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान देवी को बारंबार नमन करती है।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
sarvamaṅgalamāṅgalye śive sarvārthasādhike । śaraṇye tryambake gauri nārāyaṇi namo’stu te ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना शरण देने वाली और समस्त उद्देश्यों को सिद्ध करने वाली मंगलमयी नारायणी को नमन करती है।