आत्मोदयः परज्यानिर्द्वयं नीतिरितीयती। तदूरीकृत्य कृतिभिर्वाचस्पत्यं प्रतायते॥
ātmodayaḥ parajānir dvayaṁ nītir itīyatī । tadūrīkṛtya kṛtibhir vācaspatyaṁ pratāyate ॥
प्रधानमंत्री का संदेशआत्मिक विकास व्यक्ति के भीतर सेवा, समर्पण और राष्ट्र निर्माण की भावना का संचार करता है। इसी से प्रेरित होकर आज हमारी युवा शक्ति देश को हर क्षेत्र में आगे ले जा रही है।
आत्मोदयः परज्यानिर्द्वयं नीतिरितीयती का अर्थ
स्वयं का उत्थान करना और निरंतर आगे बढ़ना ही जीवन की सच्ची नीति है। इसी ध्येय को आधार बनाकर गुणी और विद्वान लोग अपने ज्ञान, कौशल और प्रभाव का विस्तार करते हैं, ताकि वे समाज में सकारात्मक योगदान दे सकें।
शब्दार्थ
- आत्मोदयःātmodayaḥ
अपना उत्कर्ष
आत्मन् + उद् + √इ
- परज्यानिःparajāniḥ
शत्रु का ह्रास
पर + √ज्या
- द्वयम्dvayam
दोनों
द्वि
- नीतिःnītiḥ
नीति
√नी
- इति ईयतीiti īyatī
इतनी ही है
- तत्tat
उसे
तद्
- ऊरीकृत्यūrīkṛtya
स्वीकार कर
√कृ
- कृतिभिःkṛtibhiḥ
निपुण अथवा सिद्ध व्यक्तियों द्वारा
√कृ
- वाचस्पत्यम्vācaspatyam
वाक्पटुता
वाचस्पति
- प्रतायतेpratāyate
विस्तार पाती है
प्र + √तन्
व्याख्या
माघ ने यहाँ नीति के दो पक्ष बहुत संक्षेप में रखे हैं—आत्मोदयः, अर्थात अपनी उन्नति, और परज्यानिः, अर्थात प्रतिपक्षी की हानि। अपने काव्य-संदर्भ में यह श्लोक सामान्य सदाचार का उपदेश नहीं, बल्कि व्यावहारिक राजनैतिक रणनीति का सूत्र है: नीति अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने और विरोधी की स्थिति को कमजोर करने का प्रयास करती है। ‘वाचस्पत्यम्’ शब्द प्रभावपूर्ण वाणी या वक्तृत्व का बोध कराता है; श्लोक कहता है कि निपुण विचारक इस संक्षिप्त सूत्र को विस्तार से समझा सकते हैं। प्रधानमंत्री का संदेश ‘आत्मोदयः’ को रचनात्मक आधुनिक अर्थ देता है। आत्मिक विकास व्यक्ति में सेवा, समर्पण और राष्ट्र-निर्माण की प्रेरणा जगाए, तो व्यक्तिगत प्रगति समाजोपयोगी बनती है। ज्ञान, कौशल और प्रभाव का विस्तार केवल निजी उपलब्धि न रहे, बल्कि साझा हित में लगे—संदेश का यही केंद्र है। श्लोक उन्नति का रणनीतिक लक्ष्य रखता है, जबकि प्रधानमंत्री का संदेश उस आकांक्षा को सकारात्मक सामाजिक योगदान की ओर ले जाता है।
स्रोत और पाठभेद
यह श्लोक यहाँ भी उपलब्ध है
मूल पोस्ट
शिशुपालवधम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।
सुशासन पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु फलं तथा। इति पौरुषमेवास्ति दैवमस्तु तदेव च॥
yathā yathā prayatnaḥ syād bhaved āśu phalaṃ tathā । iti pauruṣam evāsti daivam astu tad eva ca ॥
योगवासिष्ठ का यह श्लोक फल को मनुष्य के प्रयत्न से जोड़ता है और पुरुषार्थ को ही दैव मानने की शिक्षा देता है।