विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्। शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा॥
viśvasvaṃ mātaram oṣadhīnāṃ dhruvāṃ bhūmiṃ pṛthivīṃ dharmaṇā dhṛtām । śivāṃ syonām anu carema viśvahā ॥
विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं का अर्थ
जिसमें सभी प्रकार की श्रेष्ठ वनस्पतियाँ और औषधियाँ पैदा होती हैं, वह पृथ्वी माता विस्तृत और स्थिर हो। विद्या, शौर्य, सत्य, स्नेह आदि सद्गुणों से पालित-पोषित, कल्याणकारी और सुख- साधनों को देने वाली मातृभूमि की हम सदैव सेवा करें।
शब्दार्थ
- विश्वस्वम्viśvasvam
सर्वस्व वाली
विश्व + स्व
- मातरम्mātaram
माता
मातृ
- ओषधीनाम्oṣadhīnām
औषधियों की
ओषधि
- ध्रुवाम्dhruvām
स्थिर
√ध्रु
- भूमिम्bhūmim
भूमि
√भू
- पृथिवीम्pṛthivīm
पृथ्वी
√प्रथ्
- धर्मणा धृताम्dharmaṇā dhṛtām
धर्म से धारित
√धृ
- शिवाम्śivām
शिवा, कल्याणी
शिव
- स्योनाम्syonām
सुखद
स्योन
- अनु चरेमanu carema
हम चलें
अनु + √चर्
- विश्वहाviśvahā
सर्वदा
विश्व
व्याख्या
यह मंत्र पृथ्वी को ‘ओषधीनां मातरम्’—वनस्पतियों और औषधियों की माता—कहता है। वह ‘ध्रुवा’ है, अर्थात स्थिर और अविचल, तथा ‘धर्मणा धृता’ है, यानी उस धारणकारी व्यवस्था से संभली हुई है जिसे यहाँ धर्म कहा गया है। ‘शिवा’ और ‘स्योना’ उसे कल्याणकारी, अनुकूल और सुखद निवासभूमि के रूप में प्रस्तुत करते हैं। अंतिम कामना ‘अनु चरेम विश्वहा’ का सीधा अर्थ है कि हम उस पर सदा चलें या जीवन बिताएँ। वीडियो का अर्थ इस पृथ्वी-वंदना को मातृभूमि की सेवा से जोड़ता है और धर्म के आधुनिक विस्तार के रूप में विद्या, शौर्य, सत्य तथा स्नेह का उल्लेख करता है। ये गुण मंत्र में अलग-अलग शब्दों के रूप में नहीं आए हैं, बल्कि उसकी समकालीन व्याख्या हैं। मंत्र का मूल बोध अधिक आधारभूत है: हमारा जीवन स्थिर, औषधि-जननी पृथ्वी पर निर्भर है और उस पर हमारा आचरण उसे धारण करने वाली व्यवस्था के अनुरूप होना चाहिए।
मूल पोस्ट
अथर्ववेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥
sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।
प्रकृति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंसुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।