पात्रविशेषे न्यस्तं गुणान्तरं व्रजति शिल्पमाधातुः। जलमिव समुद्रशुक्तौ मुक्ताफलतां पयोदस्य॥
pātraviśeṣe nyastaṃ guṇāntaraṃ vrajati śilpam ādhātuḥ । jalam iva samudraśuktau muktāphalatāṃ payodasya ॥
प्रधानमंत्री का संदेशसच्ची प्रतिभा को जब सकारात्मक परिवेश मिलता है तो उससे अद्भुत ऊर्जा का संचार होता है। इससे जहां प्रयासों में सफलता मिलती है, वहीं जीवन भी सार्थक बनता है।
पात्रविशेषे न्यस्तं गुणान्तरं व्रजति का अर्थ
व्यक्ति या वस्तु की सार्थकता और उसका उत्थान इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार के पात्र या परिवेश को प्राप्त करती है। जिस प्रकार साधारण जल भी सीप के संपर्क में आने से अमूल्य मोती बन जाता है, उसी प्रकार उचित और सुयोग्य आश्रय मिलने पर सामान्य गुण भी परम श्रेष्ठता और प्रतिष्ठा को प्राप्त कर लेते हैं।
शब्दार्थ
- पात्रविशेषेpātraviśeṣe
विशेष रूप से योग्य पात्र में
पात्र + विशेष
- न्यस्तम्nyastam
रखा हुआ, सौंपा हुआ
नि + √अस्
- गुणान्तरम्guṇāntaram
दूसरा गुण, नई उत्कृष्टता
गुण + अन्तर
- व्रजतिvrajati
प्राप्त करता है
√व्रज्
- शिल्पम्śilpam
कला, कौशल
शिल्प
- आधातुःādhātuḥ
प्रदान करने या स्थापित करने वाले का
आ + √धा
- जलम् इवjalam iva
जल के समान
जल + इव
- समुद्रशुक्तौsamudraśuktau
समुद्र की सीप में
समुद्र + शुक्ति
- मुक्ताफलताम्muktāphalatām
मोती का रूप
मुक्ताफल + ता
- पयोदस्यpayodasya
मेघ का
पयस् + द
व्याख्या
यह श्लोक कहता है कि किसी योग्य पात्र में रखी गई शिक्षक की कला या विद्या एक नई उत्कृष्टता प्राप्त करती है। 'पात्रविशेषे' और 'न्यस्तम्' में पात्र की योग्यता तथा उसे सौंपे गए कौशल, दोनों का भाव है: ग्रहण करने वाला व्यक्ति समर्थ हो तो कला उसके भीतर विकसित होती है। कालिदास इस विचार को समुद्र की सीप में प्रवेश करके मोती बन जाने वाले मेघजल की छवि से मूर्त करते हैं; वही जल उचित पात्र पाकर नया मूल्य प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार श्लोक अंतर्निहित क्षमता, शिष्य की ग्रहणशीलता और कला प्रदान करने वाले मार्गदर्शक के परस्पर संबंध को रेखांकित करता है। प्रधानमंत्री का संदेश इस बिंब को प्रतिभा के लिए सकारात्मक परिवेश से जोड़ता है। यह आधुनिक प्रयोग श्लोक में निहित शिक्षक, पात्र और रूपान्तरण के संबंध को व्यापक सामाजिक संदर्भ देता है: उचित सहयोग मिलने पर प्रतिभा की संभावनाएं सामने आती हैं और उसके प्रयास फलदायी बनते हैं।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
मालविकाग्निमित्रम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंउद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।
अभयस्यैव यो दाता तस्यैव सुमहत्फलम् । न हि प्राणसमं दानं त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥
abhayasyaiva yo dātā tasyaiva sumahatphalam । na hi prāṇasamaṃ dānaṃ triṣu lokeṣu vidyate ॥
महाभारत का यह श्लोक अभय देने वाले की प्रशंसा करता है और तीनों लोकों में प्राण के समान किसी दान को नहीं मानता।
सामर्थ्य पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंउपदिशति लोकवृत्तं वितरति वित्तं विनोदयति चित्तम्। उत्तम्भयति महत्त्वं विद्या हृद्या सुराजसेवेव॥
upadiśati lokavṛttaṁ vitarati vittaṁ vinodayati cittam । uttambhayati mahattvaṁ vidyā hṛdyā surājaseveva ॥
हरिहर विद्या को लोक-व्यवहार, समृद्धि, प्रसन्नता और महत्त्व प्रदान करने वाली बताते हैं।
उद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः कलाः। कातरा एव जल्पन्ति यद् भाव्यं तद् भविष्यति॥
udyamasya prasādena dṛśyante vividhāḥ kalāḥ । kātarā eva jalpanti yad bhāvyaṁ tad bhaviṣyati ॥
महासुभाषितसंग्रह का यह श्लोक कहता है कि उद्यम से विविध कलाएँ प्रकट होती हैं, जबकि कातर लोग भाग्य की बात भर करते हैं।
प्रेरकः सूचकश्चैव वाचको दर्शकस्तथा। शिक्षकः बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः॥
prerakaḥ sūcakaścaiva vācako darśakastathā । śikṣakaḥ bodhakaścaiva ṣaḍete guravaḥ smṛtāḥ ॥
कुलार्णव तन्त्र गुरु के छह स्वरूप बताता है—प्रेरणा देने वाला, संकेत करने वाला, समझाने वाला, दिखाने वाला, शिक्षा देने वाला और बोध कराने वाला।