वसुदेवसुतं देवं - श्रीकृष्ण को वन्दना

4 सित॰ 2026

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

vasudevasutaṁ devaṁ kaṁsacāṇūramardanam । devakīparamānandaṁ kṛṣṇaṁ vande jagadgurum ॥

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् का अर्थ

वसुदेव-पुत्र, देव-स्वरूप, कंस और चाणूर का संहार करने वाले, माता देवकी को परम आनन्द प्रदान करने वाले जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूँ।

शब्दार्थ

वसुदेवसुतम्vasudevasutam

वसुदेव के पुत्र

वसुदेव + सुत

देवम् से पहले वसुदेवसुतं रूप में आया है।

देवम्devam

देव-स्वरूप, भगवान

देव

कंसचाणूरमर्दनम्kaṁsacāṇūramardanam

कंस और चाणूर का मर्दन करने वाले

कंस + चाणूर + √मृद्

देवकीपरमानन्दम्devakīparamānandam

देवकी के परम आनन्द

देवकी + परम + आनन्द

कृष्णम्kṛṣṇam

श्रीकृष्ण को

कृष्ण

वन्देvande

मैं वन्दना करता हूँ

√वन्द्

जगद्गुरुम्jagadgurum

जगत के गुरु को

जगत् + गुरु

व्याख्या

यह श्लोक श्रीकृष्ण के अनेक परिचयों को वन्दना के एक ही भाव में समेटता है। उन्हें वसुदेव के पुत्र और देवकी के परम आनन्द के रूप में उनके पारिवारिक सम्बन्धों से, कंस और चाणूर के मर्दन से उनके पराक्रम द्वारा, तथा ‘जगद्गुरु’ की आध्यात्मिक उपाधि से स्मरण किया गया है। ‘वन्दे’, अर्थात ‘मैं वन्दना करता हूँ’, इस पद्य को केवल गुण-वर्णन न रखकर भक्ति की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति बना देता है। निकट पारिवारिक सम्बन्धों से विश्व के गुरु तक बढ़ता हुआ श्लोक श्रीकृष्ण को एक साथ आत्मीय और सार्वभौम श्रद्धा के योग्य दिखाता है। इसका पाठ साहस, स्नेह और मार्गदर्शन को स्मरण करते हुए उन्हें ईश्वर-भक्ति से जोड़ने की सरल साधना बन सकता है।

स्रोत और पाठभेद

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मूल पोस्ट

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भक्ति पर और सुभाषित

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