मालविकाग्निमित्रम् से सुभाषित

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नवीनतम अद्यतन: 3 सित॰ 2026

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3 सित॰ 2026
मालविकाग्निमित्रम्

पात्रविशेषे न्यस्तं गुणान्तरं व्रजति शिल्पमाधातुः। जलमिव समुद्रशुक्तौ मुक्ताफलतां पयोदस्य॥

pātraviśeṣe nyastaṃ guṇāntaraṃ vrajati śilpam ādhātuḥ । jalam iva samudraśuktau muktāphalatāṃ payodasya ॥

कालिदास का यह श्लोक योग्य पात्र में विकसित कौशल की तुलना सीप में मोती बनने वाले मेघजल से करता है।

सामर्थ्यशिक्षामार्गदर्शन
1 जून 2026
मालविकाग्निमित्रम्

श्लिष्टा क्रिया कस्यचिदात्मसंस्था सङ्क्रान्तिरन्यस्य विशेषयुक्ता। यस्योभयं साधु स शिक्षकाणां धुरि प्रतिष्ठापयितव्य एव॥

śliṣṭā kriyā kasyacid ātmasaṃsthā saṅkrāntir anyasya viśeṣayuktā । yasyobhayaṃ sādhu sa śikṣakāṇāṃ dhuri pratiṣṭhāpayitavya eva ॥

यह श्लोक उस दुर्लभ शिक्षक की प्रशंसा करता है जिसमें स्वयं निपुण होने की क्षमता और दूसरों तक ज्ञान-कौशल पहुँचाने की योग्यता, दोनों साथ हों।

शिक्षाविद्यामार्गदर्शनसामर्थ्य