अभीप्सां स्वात्मनो रक्षा - निरंतर प्रयास की सिद्धि

9 मार्च 2026

अभीप्सां स्वात्मनो रक्षाऽविरतं सुस्थिरं तया। यत्नमातिष्ठ धैर्येण ततः सिद्धिर्भवेद् ध्रुवम्॥

abhīpsāṁ svātmano rakṣā’virataṃ susthiraṁ tayā । yatnam ātiṣṭha dhairyeṇa tataḥ siddhir bhaved dhruvam ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

T20 क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतकर टीम इंडिया ने साबित कर दिया है कि दृढ़ संकल्प, संयम और आत्मविश्वास का संगम ही जीवन में सफलता का मूलमंत्र है। यह जीत हमें यह भी बताती है कि सही दिशा में कठिन परिश्रम से हर लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।

अभीप्सां स्वात्मनो रक्षाऽविरतं सुस्थिरं का अर्थ

जो व्यक्ति अपने जीवन में उन्नति चाहता है, उसे निरंतर और दृढ़ निश्चय के साथ प्रयास करना चाहिए। धैर्यपूर्वक किया गया सतत् परिश्रम ही निश्चित रूप से सफलता का मार्ग खोलता है।

शब्दार्थ

अभीप्साम्abhīpsām

अभीप्सा को

अभि + √आप्

स्वात्मनःsvātmanaḥ

अपनी

स्व + आत्मन्

रक्षrakṣa

रक्षा करो

√रक्ष्

अविरतम्aviratam

निरन्तर

अ + वि + √रम्

सुस्थिरम्susthiram

सुदृढ़ रूप से

सु + √स्था

तयाtayā

उसके द्वारा

तद्

यत्नम्yatnam

प्रयत्न में

√यत्

आतिष्ठātiṣṭha

स्थित हो

आ + √स्था

धैर्येणdhairyeṇa

धैर्य से

√धृ

ततःtataḥ

तब

तद्

सिद्धिःsiddhiḥ

सिद्धि

√सिध्

भवेत् ध्रुवम्bhaved dhruvam

निश्चय ही होगी

√भू

व्याख्या

यह सुभाषित जीवन में 'अभ्युदय' या उन्नति के लिए आवश्यक तत्वों को रेखांकित करता है। यहाँ 'अभीप्सा' (आगे बढ़ने की इच्छा) को 'यत्न' (प्रयास) और 'धैर्य' के साथ जोड़ा गया है। श्लोक का संदेश है कि सफलता कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि 'अविरत' (बिना रुके) और 'सुस्थिर' (अडिग) परिश्रम का प्रतिफल है। जब संकल्प में दृढ़ता और प्रयासों में निरंतरता होती है, तो 'सिद्धि' यानी सफलता निश्चित (ध्रुव) हो जाती है। टीम इंडिया की जीत के संदर्भ में यह श्लोक सटीक बैठता है—जहाँ खिलाड़ियों के धैर्य और अटूट आत्मविश्वास ने उन्हें विश्व पटल पर विजेता बनाया। पहला निर्देश ध्यान से छूट जाना सरल है। किसी प्रयत्न की माँग से पूर्व श्लोक कहता है 'रक्ष'—अभीप्सा की ही रक्षा करो, अविरत और सुस्थिर रूप से। तभी आता है 'यत्नमातिष्ठ' अर्थात् प्रयत्न में स्थित हो। यह क्रम सूचित करता है कि लक्ष्य वह वस्तु है जो परिश्रम करते रहते हुए भी खो सकती है, और उसकी रक्षा उसकी प्राप्ति से भिन्न अनुशासन है—इसीलिए दूसरे चरण के ढंग के रूप में धैर्य का नाम लिया गया है।

मूल पोस्ट

पोस्ट लोड हो रहा है...

महासुभाषितसंग्रह से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
21 सित॰ 2026
विदुर नीति

एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥

eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥

महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।

धर्मशांतिविद्याअहिंसा
16 सित॰ 2026
महाभारत

अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥

advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥

महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।

साहसज्ञानदृढ़तासमृद्धि

दृढ़ता पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता