यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः। यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः। सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥
yārṇave’dhi salilam agra āsīd yāṁ māyābhir anvacaran manīṣiṇaḥ । yasyā hṛdayaṁ parame vyoman tsatyenāvṛtam amṛtaṁ pṛthivyāḥ । sā no bhūmis tviṣiṁ balaṁ rāṣṭre dadhātūttame ॥
यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां का अर्थ
जो पृथ्वी भीतर से समुद्र के जल से भरी हुई है और बाहर भी जल से घिरी हुई है, जिसे विचारशील विद्वानों ने अपनी बुद्धि से समझा और स्वीकार किया है और जिसका अंतरतम भाग अनन्त आकाश में स्थित अविनाशी सत्य से आच्छादित है, ऐसी पवित्र पृथ्वी हमारे तेज, शक्ति और सामर्थ्य को एक श्रेष्ठ राष्ट्र में सुरक्षित और स्थिर रखे।
शब्दार्थ
- याyā
जो
यद्
- अर्णवे अधिarṇave adhi
समुद्र के ऊपर
अर्णव
- सलिलम्salilam
जल रूप में
सलिल
- अग्रे आसीत्agre āsīt
आदि में थी
√अस्
- याम्yām
जिसे
यद्
- मायाभिःmāyābhiḥ
मायाओं से
माया
- अन्वचरन्anvacaran
अनुसरण किया
अनु + √चर्
- मनीषिणःmanīṣiṇaḥ
मनीषी जन
मनीषा
- यस्याः हृदयम्yasyā hṛdayam
जिसका हृदय
हृदय
- परमे व्योमन्parame vyoman
परम व्योम में
व्योमन्
- सत्येन आवृतम्satyenāvṛtam
सत्य से आवृत
सत्य + आ + √वृ
- अमृतम्amṛtam
अमृत
अ + √मृ
- सा नः भूमिःsā no bhūmiḥ
वह भूमि हमें
√भू
- त्विषिम् बलम्tviṣiṁ balam
तेज और बल
√त्विष् + बल
- राष्ट्रे दधातु उत्तमेrāṣṭre dadhātūttame
इस उत्तम राष्ट्र में दे
√धा
व्याख्या
अथर्ववेद के भूमि सूक्त का यह मन्त्र पृथ्वी को आरम्भ में समुद्र में अथवा उसके ऊपर जलरूप में स्मरण करता है; वह यह नहीं कहता कि पृथ्वी आज जल से घिरी हुई है। मनीषियों ने 'मायाभिः', अर्थात शक्तियों, उपायों या कलाओं से, उसका अनुसरण किया और उसका अमृत हृदय परम व्योम में सत्य से आवृत बताया गया है। अन्तिम प्रार्थना पृथ्वी से उत्तम राष्ट्र में अथवा उसके लिए तेज और बल रखने की है, यद्यपि 'राष्ट्रे दधातु उत्तमे' का सटीक विन्यास एकाधिक प्रकार से पढ़ा जा सकता है। पर्यावरण और राष्ट्रप्रेम इसके आधुनिक अनुप्रयोग हैं, कठिन वैदिक बिम्बों का एकमात्र अनुवाद नहीं।
मूल पोस्ट
अथर्ववेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥
sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।
प्रकृति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।