स्वस्ति पन्थामनुचरेम - कल्याणकारी मार्ग

11 मार्च 2026

स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव। पुनर्ददाताघ्नता जानता सङ्गमेमहि॥

svasti panthām anucarema sūryācandramasāviva । punardadatāghnatā jānatā saṅgamemahi ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

भारतवासियों की असीम शक्ति ही देश के विकास की धुरी है। अपने सामर्थ्य और परस्पर विश्वास से हम हर संकल्प को साकार करते आए हैं और आगे भी करते रहेंगे।

स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव का अर्थ

हम सूर्य और चन्द्रमा के समान निरन्तर शुभ मार्ग पर चलते रहें। हम परस्पर अहिंसा, सद्भाव और ज्ञान के साथ आगे बढ़ें तथा एक-दूसरे के सहयोग से उन्नति और कल्याण की ओर अग्रसर हों।

शब्दार्थ

स्वस्तिsvasti

कल्याण

सु + √अस्

पन्थाम्panthām

मार्ग पर

पथिन्

अनुचरेमanucarema

हम चलें

अनु + √चर्

सूर्याचन्द्रमसौ इवsūryācandramasāv iva

सूर्य और चन्द्रमा के समान

सूर्य + चन्द्रमस्

पुनर्ददाताpunardadatā

पुनः देने वाले के साथ

पुनर् + √दा

अघ्नताaghnatā

हिंसा न करने वाले के साथ

अ + √हन्

जानताjānatā

जानने वाले के साथ

√ज्ञा

सङ्गमेमहिsaṅgamemahi

हम मिलें

सम् + √गम्

पूरा मन्त्र उत्तम पुरुष बहुवचन में—यह संकल्प है, उपदेश नहीं।

व्याख्या

यह ऋग्वैदिक मन्त्र कामना करता है कि हम सूर्य और चन्द्रमा के समान कल्याण के मार्ग पर चलें और पुनः देने वाले, हिंसा न करने वाले तथा जानने वाले लोगों से मिलें। 'पुनर्ददाता', 'अघ्नता' और 'जानता' करण कारक के रूप हैं; वे उन साथियों का वर्णन करते हैं जिनसे वक्ता मिलना चाहते हैं, वक्ताओं के अपने गुणों का नहीं। 'अनुचरेम' और 'सङ्गमेमहि' दोनों उत्तम पुरुष बहुवचन विधिलिङ् हैं, इसलिए यह दूसरों को दिया उपदेश नहीं, सामूहिक कामना है। सामाजिक समरसता इसका उचित अनुप्रयोग है, पर पाठ उसे चुनी हुई संगति और अनुसरण किए जाने वाले मार्ग दोनों से व्यक्त करता है।

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ऋग्वेद से और सुभाषित

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22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण
10 सित॰ 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

कल्याणभक्तिआध्यात्मिकता
27 अग॰ 2026
ऋग्वेद

तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्। अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥

tantuṃ tanvan rajaso bhānum anv ihi jyotiṣmataḥ patho rakṣa dhiyā kṛtān । anulbaṇaṃ vayata joguvām apo manur bhava janayā daivyaṃ janam ॥

ऋग्वेद का यह मन्त्र बुद्धि से निर्मित ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा और सच्चा मनुष्य बनकर दैवी गुणों से युक्त जन के निर्माण का आह्वान करता है।

विद्याकर्तव्यचरित्रआध्यात्मिकता

सामंजस्य पर और सुभाषित

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12 अक्टू॰ 2026
देवी महात्म्यम्

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥

devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥

देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।

भक्तिशक्तिकल्याण
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
23 सित॰ 2026
चरक संहिता

हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥

hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥

चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।

स्वास्थ्यकल्याण