सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥
satyameva jayati nānṛtaṃ satyena panthā vitato devayānaḥ । yenākramantyṛṣayo hyāptakāmā yatra tatsatyasya paramaṃ nidhānam ॥
प्रधानमंत्री का संदेशसन् 1930 में आज ही के दिन दांडी मार्च की शुरुआत हुई थी। इसमें शामिल सभी विभूतियों का श्रद्धापूर्वक स्मरण!
सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन का अर्थ
सत्य की ही जीत होती है, असत्य की नहीं। सत्य के द्वारा ही वह देवयान मार्ग (दिव्य मार्ग) विस्तृत होता है, जिससे होकर पूर्णकाम (जिनकी इच्छाएँ पूर्ण हो चुकी हों) ऋषि उस स्थान तक पहुँचते हैं जहाँ सत्य का परम निधान (खजाना) है।
शब्दार्थ
- सत्यम्satyam
सत्य
√अस्
- एवeva
ही
- जयतिjayati
जय पाता है
√जि
- नna
नहीं
- अनृतम्anṛtam
असत्य
अ + ऋत
- सत्येनsatyena
सत्य से
सत्य
- पन्थाःpanthāḥ
मार्ग
पथिन्
- विततःvitataḥ
विस्तृत है
वि + √तन्
- देवयानःdevayānaḥ
देवयान
देव + √या
- येनyena
जिससे
यद्
- आक्रमन्तिākramanti
आरोहण करते हैं
आ + √क्रम्
- ऋषयःṛṣayaḥ
ऋषिगण
√ऋष्
- हिhi
निश्चय ही
- आप्तकामाःāptakāmāḥ
जिनकी कामनाएँ पूर्ण हैं
√आप् + काम
- यत्रyatra
जहाँ
- तत् सत्यस्यtat satyasya
वह सत्य का
तद् + सत्य
- परमम्paramam
परम
परम
- निधानम्nidhānam
निधान
नि + √धा
व्याख्या
मुण्डकोपनिषद् का यह मंत्र भारतीय संस्कृति और दर्शन का प्राण है, जिसे स्वतंत्र भारत ने अपने राष्ट्रीय आदर्श वाक्य 'सत्यमेव जयते' के रूप में अपनाया। यह श्लोक सत्य को केवल एक नैतिक गुण नहीं, बल्कि उस परम लक्ष्य तक पहुँचने वाले मार्ग के रूप में परिभाषित करता है। दांडी मार्च की वर्षगांठ पर इसे साझा करना इस बात का प्रतीक है कि कैसे महात्मा गांधी ने 'सत्याग्रह' के माध्यम से इस उपनिषदीय सत्य को जन-आंदोलन की शक्ति बनाया। यह हमें सिखाता है कि सत्य का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन अंतिम विजय और आत्म-साक्षात्कार केवल सत्यनिष्ठ होने से ही संभव है।
मूल पोस्ट
धर्म पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।