हितं यत्सर्वभूतानाम् - सबके हित का कर्म

10 जुल॰ 2026

हितं यत्सर्वभूतानामात्मानश्च सुखावहम्। तत्कुर्यादीश्वरे ह्येतन्मूलं सर्वार्थसिद्धये॥

hitaṃ yat sarvabhūtānām ātmānaśca sukhāvaham । tat kuryād īśvare hy etan mūlaṃ sarvārthasiddhaye ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

निःस्वार्थ कर्म ही मानवता की सबसे बड़ी शक्ति है। हम सेवा और समर्पण के इसी भाव के साथ हर किसी के जीवन को बेहतर बनाने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे हैं।

हितं यत्सर्वभूतानामात्मानश्च सुखावहम् का अर्थ

मनुष्य को वही कार्य करना चाहिए जो सभी प्राणियों के लिए हितकारी हो और स्वयं की आत्मा के लिए शांति देने वाला हो। ईश्वर के प्रति वास्तविक समर्पण भी यही है, क्योंकि यही मार्ग समस्त पुरुषार्थों और सिद्धियों का मूल आधार है।

शब्दार्थ

हितम्hitam

हितकर

√धा

यत्yat

जो

यद्

सर्वभूतानाम्sarvabhūtānām

समस्त प्राणियों के लिए

सर्व + √भू

आत्मनःātmanaḥ

आत्मा को

आत्मन्

चca

और

सुखावहम्sukhāvaham

सुख देने वाला

सुख + √वह्

तत् कुर्यात्tat kuryāt

वही करना चाहिए

√कृ

ईश्वरेīśvare

ईश्वर में

√ईश्

हि एतत्hy etat

क्योंकि यही

एतद्

मूलम्mūlam

मूल है

मूल

सर्वार्थसिद्धयेsarvārthasiddhaye

समस्त अर्थों की सिद्धि के लिए

सर्व + अर्थ + √सिध्

व्याख्या

यह श्लोक उचित कर्म की एक संक्षिप्त कसौटी देता है: वह सभी प्राणियों के लिए हितकारी हो और अपने लिए भी सुख अथवा कल्याण लाए। 'हितम्' का अर्थ केवल अच्छा लगने वाली बात नहीं, बल्कि वास्तविक कल्याण है। 'सर्वभूतानाम्' को अपने सुख से जोड़कर श्लोक बताता है कि लोकहित और अंतःकरण की शुद्धता अलग-अलग नहीं हैं। दूसरी पंक्ति ऐसे कर्म को ईश्वर-समर्पण से जोड़ती है, इसलिए सेवा केवल सामाजिक कार्य नहीं रहती, वह आध्यात्मिक साधना भी बन जाती है। सभी पुरुषार्थों और सिद्धियों का मूल इसी सामंजस्य में है, जहाँ कल्याण, विवेक और भक्ति एक दिशा में चलते हैं। प्रधानमंत्री के पोस्ट में निःस्वार्थ कर्म, सेवा और हर जीवन को बेहतर बनाने का संकल्प इसी शिक्षा का समकालीन रूप है।

मूल पोस्ट

पोस्ट लोड हो रहा है...
इन चयनित श्लोक पृष्ठों में शामिल

विदुर नीति से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

निःस्वार्थ सेवा पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
8 अक्टू॰ 2026

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।

स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस