अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपां रेतांसि जिन्वति॥
agnirmūrdhā divaḥ kakutpatiḥ pṛthivyā ayam । apāṁ retāṁsi jinvati ॥
प्रधानमंत्री का संदेशवर्ष 1998 में आज के दिन पोखरण में हुए परमाणु परीक्षण ने दुनिया को भारत के अद्भुत सामर्थ्य से परिचित कराया। हमारे वैज्ञानिक देश के गौरव और स्वाभिमान के सच्चे शिल्पी हैं।
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या का अर्थ
अग्नि द्युलोक की सर्वोच्च शक्ति है और पृथ्वी पर स्थित समस्त ऊर्जा का मूल स्रोत है। वही अग्नि-तत्त्व पदार्थ के सूक्ष्मतम कणों में निहित अपरिमित शक्ति को जागृत करता है तथा समस्त सृष्टि में ऊर्जा और गति का संचार करता है।
शब्दार्थ
- अग्निःagniḥ
अग्नि
अग्नि
- मूर्धाmūrdhā
शिर
मूर्धन्
- दिवःdivaḥ
द्युलोक का
दिव्
- ककुत्kakut
शिखर
ककुद्
- पतिःpatiḥ
स्वामी
पति
- पृथिव्याःpṛthivyāḥ
पृथ्वी का
पृथिवी
- अयम्ayam
यह
इदम्
- अपाम्apām
जलों के
अप्
- रेतांसिretāṁsi
बीजों को
रेतस्
- जिन्वतिjinvati
प्रेरित करता है
√जिन्व्
व्याख्या
यह वैदिक मंत्र अग्नि को द्युलोक का मूर्धा या शिखर, पृथ्वी का स्वामी बताता है, जो जलों के बीजों अथवा सृजन-शक्तियों को प्रेरित करता है। अग्नि दृश्य यज्ञाग्नि भी है और पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा द्युलोक को जोड़ने वाला ब्रह्माण्डीय तत्त्व भी। संक्षिप्त बिंब सृजनशील ऊर्जा, मध्यस्थता और विश्व के विभिन्न स्तरों को जोड़ने वाली शक्ति पर बल देता है। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस पर साझा किए जाने के कारण मंत्र को आधुनिक विज्ञान और परमाणु ऊर्जा से रूपकात्मक रूप में जोड़ा गया। वह पोस्ट का समकालीन अनुप्रयोग है; ‘अपां रेतांसि जिन्वति’ कहता है कि अग्नि जलों के बीजों अथवा सृजन-शक्तियों को प्रेरित करता है, सूक्ष्म परमाणु कणों को शाब्दिक रूप से नहीं।
मूल पोस्ट
ऋग्वेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।
शं नो वातः पवतां शं नस्तपतु सूर्यः। शं नः कनिक्रदद् देवः पर्जन्योऽभिवर्षतु॥
śaṃ no vātaḥ pavatāṃ śaṃ nas tapatu sūryaḥ । śaṃ naḥ kanikradad devaḥ parjanyo 'bhivarṣatu ॥
शुक्ल यजुर्वेद का यह मन्त्र वायु, सूर्य और वर्षा के देवता पर्जन्य से कल्याणकारी होने की प्रार्थना करता है।
प्रकृति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।