यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम्। तत् सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्॥
yad dūraṃ yad durārādhyaṃ yacca dūre vyavasthitam । tat sarvaṃ tapasā sādhyaṃ tapo hi duratikramam ॥
प्रधानमंत्री का संदेशभारत के लोग अपने दृढ़ निश्चय से किसी भी कार्य को संभव बना देते हैं। सही दिशा में अपनी अथक मेहनत से वे बड़े से बड़े लक्ष्य को भी हासिल कर दिखाते हैं।
यद् दूरं यद् दुराराध्यं का अर्थ
चाहे लक्ष्य कितना ही दूर, कठिन या पहुँच से बाहर क्यों न लगे, अटल संकल्प और निरंतर परिश्रम से उसे प्राप्त किया जा सकता है। दृढ़ता और धैर्य ही वे शक्तियाँ हैं जो असंभव को संभव बनाती हैं।
शब्दार्थ
- यत् दूरम्yad dūram
जो दूर है
दूर
- यत् दुराराध्यम्yad durārādhyam
जो दुराराध्य है
दुस् + आ + √राध्
- यत् च दूरे व्यवस्थितम्yac ca dūre vyavasthitam
और जो दूर स्थित है
वि + अव + √स्था
- तत् सर्वम्tat sarvam
वह सब
सर्व
- तपसाtapasā
तप से
√तप्
- साध्यम्sādhyam
साध्य है
√साध्
- तपः हिtapo hi
क्योंकि तप
√तप्
- दुरतिक्रमम्duratikramam
दुरतिक्रम्य है
दुस् + अति + √क्रम्
व्याख्या
चाणक्य नीति का यह श्लोक "तप" की अजेय शक्ति का वर्णन करता है। यहाँ "तप" का अर्थ केवल कंदराओं में की जाने वाली तपस्या नहीं, बल्कि किसी लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण और अथक परिश्रम है। श्लोक हमें आश्वस्त करता है कि जो चीजें हमारी पहुँच से बाहर (दूर) या अत्यंत कठिन (दुराराध्य) लगती हैं, वे भी निरंतर और केंद्रित प्रयास से प्राप्त की जा सकती हैं। यह हमें सिखाता है कि सफलता का मार्ग बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आंतरिक संकल्प की तीव्रता से निर्धारित होता है। जैसे स्वर्ण अग्नि में तपकर कुंदन बनता है, वैसे ही मनुष्य का संकल्प पुरुषार्थ की अग्नि (तप) में तपकर असंभव को भी संभव बना देता है। साझा अर्थ 'तपस्' को संकल्प और परिश्रम कहता है, जबकि श्लोक का आधार तप ही है—दूर, दुराराध्य और दूरस्थ सब कुछ तप से सिद्ध होता है, और 'तपो हि दुरतिक्रमम्' उसी अलंघ्य सामर्थ्य को दोहराता है।
मूल पोस्ट
चाणक्य नीति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंप्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥
prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥
चाणक्य नीति का यह श्लोक सिखाता है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे सिंह की तरह पूर्ण समर्पण और पूरे प्रयास से करना चाहिए।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥
jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥
यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।
विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥
vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥
यह श्लोक विद्या और विद्वानों की महिमा का गुणगान करता है। ज्ञान से न केवल सम्मान प्राप्त होता है, बल्कि जीवन की समस्त उपलब्धियाँ भी मिलती हैं।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।