उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्। सोत्साहस्यास्ति लोकेऽस्मिन् न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥
utsāho balavān ārya nāsty utsāhāt paraṃ balam । sotsāhasyāsti loke’smin na kiñcid api durlabham ॥
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं का अर्थ
उत्साह ही सबसे बड़ा बल है, वस्तुतः उत्साह से बढ़कर कोई अन्य शक्ति नहीं। इस संसार में उत्साही व्यक्ति के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता।
शब्दार्थ
- उत्साहःutsāhaḥ
उत्साह
उद् + √सह्
- बलवान्balavān
बलवान् है
बल
- आर्यārya
हे आर्य
सम्बोधन—लक्ष्मण का राम को।
- न अस्तिnāsti
नहीं है
√अस्
- उत्साहात्utsāhāt
उत्साह से
उद् + √सह्
- परम्param
बढ़कर
पर
- बलम्balam
बल
बल
- सोत्साहस्यsotsāhasya
उत्साही के लिए
स + उत्साह
- लोके अस्मिन्loke'smin
इस संसार में
लोक
- न किञ्चिद् अपिna kiñcid api
कुछ भी नहीं
- दुर्लभम्durlabham
दुर्लभ
दुस् + √लभ्
व्याख्या
वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धा काण्ड के प्रारंभ में लक्ष्मण जी ने यह शब्द श्री राम से कहे थे। जब सीता जी की खोज के दौरान श्री राम विचलित हो रहे थे, तब लक्ष्मण उन्हें याद दिलाते हैं कि 'उत्साह' मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। यह सुभाषित हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में केवल शारीरिक बल पर्याप्त नहीं होता, बल्कि आंतरिक उत्साह और ऊर्जा ही हमें बड़े से बड़े संकट से उबारती है। एक उत्साही मन के लिए इस जगत में कोई भी बाधा अभेद्य नहीं है और कोई भी सफलता अप्राप्य नहीं है। प्रथम पंक्ति का 'आर्य' सम्बोधन है और उद्धरण के समय प्रायः छोड़ दिया जाता है। यह लक्ष्मण का राम को सम्बोधन है, और इसे बनाए रखने से श्लोक वही बन जाता है जो वह है—एक भाई का उस दूसरे भाई से कथन जिसका मन अभी टूटा है, न कि स्वतन्त्र रूप से खड़ी कोई सूक्ति। तब यह दावा भी भिन्न पढ़ा जाता है: यह उत्साह विषयक सामान्य सत्य नहीं, उस विशेष व्यक्ति के लिए किया गया तर्क है जिसे उस क्षण उसकी आवश्यकता है।
मूल पोस्ट
वाल्मीकि रामायण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंदैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्। न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति॥
daivaṁ puruṣakāreṇa yaḥ samarthaḥ prabādhitum । na daivena vipannārthaḥ puruṣaḥ so’vasīdati ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि जो मनुष्य पुरुषार्थ से दैव का सामना करने में समर्थ है, वह विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होता।
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥ दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥
lokapālāśca te sarve vāsavapramukhāstathā । ṛtavaḥ ṣaṭ ca te sarve māsāḥ saṁvatsarāḥ kṣapāḥ ॥ dināni ca muhūrtāśca svasti kurvantu te sadā । śrutiḥ smṛtiśca dharmaśca pātu tvāṁ putra sarvataḥ ॥
अयोध्या काण्ड के इस आशीर्वचन में लोकपालों, कालचक्र, श्रुति-स्मृति और धर्म से निरंतर मंगल तथा सर्वांगीण रक्षा की प्रार्थना की गई है।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्। अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥
anirvedaḥ śriyo mūlam anirvedaḥ paraṁ sukham । anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ ॥
वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड का यह श्लोक बताता है कि निराशा से मुक्त उत्साह, दृढ़ विश्वास और सतत प्रयास ही उन्नति और सफलता का आधार हैं।
ऊर्जा पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।