उद्भिन्नस्तबका - वसंत का उल्लास

4 मार्च 2026

उद्भिन्नस्तबकावतंससुभगाः प्रेङ्खन्मरुन्नर्तिताः पुष्पोद्गीर्णपरागपांशुललसत्पत्रप्रकाण्डत्विषः। गम्भीरक्रमपञ्चमोन्मदपिकध्वानोच्छलद्गीतयः प्रत्युज्जीवितमन्मथोत्सव इव क्रीडन्त्यमू भूरुहाः॥

udbhinnastabakāvataṃsasubhagāḥ preṅkhanmarunnartitāḥ puṣpodgīrṇaparāgapāṃśulalasatpatraprakāṇḍatviṣaḥ । gambhīrakramapañcamonmadapikadhvānocchaladgītayaḥ pratyujjīvitamanmathotsava iva krīḍantyamū bhūruhaḥ ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

होली का त्योहार पूरे माहौल में नई ऊर्जा भर देता है। यही इस उत्सव की बड़ी विशेषता है। हर तरफ जिस प्रकार खुशियों के रंग बिखरे नजर आते हैं, वो हर किसी को उल्लास और आनंद से सराबोर कर जाता है।

उद्भिन्नस्तबकावतंससुभगाः का अर्थ

ये वृक्ष मानो पुनर्जीवित कामदेव (मन्मथ) का उत्सव मनाते हुए क्रीड़ा कर रहे हैं—खिले हुए फूलों के गुच्छों रूपी कर्णफूलों से सुशोभित होकर, बहती हुई मन्द वायु से नर्तन करते हुए, फूलों से झड़ते हुए पराग के कणों से चमकती हुई पत्तों और शाखाओं वाली शोभा से युक्त होकर, और मदमस्त कोयलों के पंचम स्वर में गूँजते हुए मधुर गीतों के साथ।

शब्दार्थ

उद्भिन्नस्तबकावतंससुभगाःudbhinnastabakāvataṁsasubhagāḥ

खिले गुच्छों रूपी कर्णफूलों से सुन्दर

उद् + √भिद् + स्तबक + अवतंस

प्रेङ्खन्मरुन्नर्तिताःpreṅkhanmarunnartitāḥ

झूमती वायु से नचाए गए

प्र + √ईङ्ख् + मरुत् + √नृत्

पुष्पोद्गीर्णपरागपांशुललसत्पत्रप्रकाण्डत्विषःpuṣpodgīrṇaparāgapāṁśulalasatpatraprakāṇḍatviṣaḥ

फूलों से झरे पराग-कणों से चमकते पत्तों और शाखाओं वाले

पुष्प + उद् + √गॄ + पराग + पांशु + √लस् + पत्र + प्रकाण्ड + त्विष्

गम्भीरक्रमपञ्चमोन्मदपिकध्वानोच्छलद्गीतयःgambhīrakramapañcamonmadapikadhvānocchaladgītayaḥ

मदमस्त कोयल के गम्भीर पञ्चम स्वर से उछलते गीतों वाले

गम्भीर + क्रम + पञ्चम + उद् + मद + पिक + ध्वान + उद् + √शल् + गीति

प्रत्युज्जीवितमन्मथोत्सवःpratyujjīvitamanmathotsavaḥ

पुनर्जीवित कामदेव का उत्सव

प्रति + उद् + √जीव् + मन्मथ + उत्सव

इवiva

मानो

क्रीडन्तिkrīḍanti

क्रीड़ा करते हैं

√क्रीड्

क्रिया अन्तिम चरण तक रोकी गई है।

अमू भूरुहाःamū bhūruhāḥ

वे वृक्ष

भू + √रुह्

व्याख्या

सुभाषितरत्नकोश का यह श्लोक वसन्त का सजीव चित्रण करता है। वृक्ष नए खिले पुष्पगुच्छों रूपी कर्णाभूषणों से सजे, वायु से नाचते, पराग से धूलित और कोयल के गम्भीर पञ्चम स्वर से गूँजते दिखाई देते हैं। वे मानो पुनर्जीवित मन्मथोत्सव में क्रीड़ा करते हैं। संस्कृत वसन्त और मन्मथ के उत्सव को कहती है, विशेष रूप से होली को नहीं; पराग और उत्सव को होली से जोड़ना आकर्षक उत्तरवर्ती अनुप्रयोग है। दीर्घ समासों के बाद 'क्रीडन्ति' आने से अन्त में वर्णित वृक्ष गति पकड़ते हैं।

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प्रकृति पर और सुभाषित

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22 सित॰ 2026
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प्रकृतिधर्म