संस्कृति पर सुभाषित

5 सुभाषित इस विषय पर

यह विषय 6 स्रोतों से आए 5 सुभाषितों को एक साथ लाता है।

नवीनतम अद्यतन: 13 जुल॰ 2026

13 जुल॰ 2026
मनुस्मृति

कन्यानां सम्प्रदानञ्च कुमाराणाञ्च रक्षणम्। राष्ट्रस्य सङ्ग्रहे नित्यं विधानमिदमाचरेत्॥

kanyānāṃ sampradānañca kumārāṇāñca rakṣaṇam । rāṣṭrasya saṅgrahe nityaṃ vidhānam idam ācaret ॥

मनुस्मृति-आधारित यह शिक्षा कन्याओं के कल्याण, नई पीढ़ी की रक्षा और राष्ट्र की स्थिरता व समृद्धि के लिए सतत प्रबंध को जनप्रतिनिधि का कर्तव्य बताती है।

सुशासनकर्तव्यनारीशक्तिसंस्कृति
29 जून 2026
विदुर नीति

देशाचारान् समयाञ्जातिधर्मान् बुभूषते यस्तु परावरज्ञः। स तत्र तत्राधिगतः सदैव महाजनस्याधिपत्यं करोति॥

deśācārān samayāñ jātidharmān bubhūṣate yastu parāvarajñaḥ । sa tatra tatrādhigataḥ sadaiva mahājanasyādhipatyaṁ karoti ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि स्थानीय आचार, सामाजिक मर्यादाओं और समुदायों की समझ से विश्वास, सम्मान और प्रभाव प्राप्त होता है।

ज्ञानसंस्कृतिसम्मानचरित्र
15 जून 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना कुण्डे कुण्डे नवं पयः। जातौ जातौ नवाचाराः नवा वाणी मुखे मुखे॥

piṇḍe piṇḍe matir bhinnā kuṇḍe kuṇḍe navaṃ payaḥ । jātau jātau navācārāḥ navā vāṇī mukhe mukhe ॥

यह सुभाषित बताता है कि विविध समाज में हर मन, समुदाय, आचार और वाणी की अपनी अलग पहचान होती है।

विविधतावैयक्तिकतासंस्कृति
21 मई 2026
अथर्ववेद

यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन्। गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु॥

yasyāṁ pūrve pūrvajanā vicakrire yasyāṁ devā asurān abhyavartayan । gavāmaśvānāṁ vayasaś ca viṣṭhā bhagaṁ varcaḥ pṛthivī no dadhātu ॥

अथर्ववेद के भूमि सूक्त का यह ऐतिहासिक मंत्र उस मातृभूमि का आह्वान करता है जो पूर्वजों के महान पुरुषार्थ और दैवी शौर्य की साक्षी रही है, ताकि वह लोक को ऊर्जा और ऐश्वर्य से समृद्ध करे।

प्रकृतिसंस्कृतिसाहससमृद्धि
4 मार्च 2026
सुभाषितरत्नकोश

उद्भिन्नस्तबकावतंससुभगाः प्रेङ्खन्मरुन्नर्तिताः पुष्पोद्गीर्णपरागपांशुललसत्पत्रप्रकाण्डत्विषः। गम्भीरक्रमपञ्चमोन्मदपिकध्वानोच्छलद्गीतयः प्रत्युज्जीवितमन्मथोत्सव इव क्रीडन्त्यमू भूरुहाः॥

udbhinnastabakāvataṃsasubhagāḥ preṅkhanmarunnartitāḥ puṣpodgīrṇaparāgapāṃśulalasatpatraprakāṇḍatviṣaḥ । gambhīrakramapañcamonmadapikadhvānocchaladgītayaḥ pratyujjīvitamanmathotsava iva krīḍantyamū bhūruhaḥ ॥

सुभाषितरत्नकोश से लिया गया यह श्लोक वसंत ऋतु में प्रकृति के सौंदर्य और होली के उत्सव जैसा उल्लास प्रकट करता है।

प्रकृतिसंस्कृति