पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना - विविधता में वैयक्तिकता

15 जून 2026

पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना कुण्डे कुण्डे नवं पयः। जातौ जातौ नवाचाराः नवा वाणी मुखे मुखे॥

piṇḍe piṇḍe matir bhinnā kuṇḍe kuṇḍe navaṃ payaḥ । jātau jātau navācārāḥ navā vāṇī mukhe mukhe ॥

पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना कुण्डे का अर्थ

नवाचार और उद्यम के क्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति की सोच और सर्जनात्मक दृष्टि अलग-अलग होती है और यही विविधता नई संभावनाओं को जन्म देती है। जिस प्रकार हर जल-स्रोत का स्वाद भिन्न होता है, उसी प्रकार हर प्रतिभा अपनी अनूठी पहचान और योगदान रखती है। इन्हीं भिन्न-भिन्न विचारों और क्षमताओं के समन्वय से नवाचार और प्रगति संभव होती है।

शब्दार्थ

पिण्डे पिण्डेpiṇḍe piṇḍe

प्रत्येक शरीर में

पिण्ड

मतिःmatiḥ

मति

√मन्

भिन्नाbhinnā

भिन्न

√भिद्

कुण्डे कुण्डेkuṇḍe kuṇḍe

प्रत्येक कुण्ड में

कुण्ड

नवम्navam

नया

नव

पयःpayaḥ

जल

पयस्

जातौ जातौjātau jātau

प्रत्येक जाति में

√जन्

नवाचाराःnavācārāḥ

नए आचार

नव + आ + √चर्

नवाnavā

नई

नव

वाणीvāṇī

वाणी

√वण्

मुखे मुखेmukhe mukhe

प्रत्येक मुख में

मुख

व्याख्या

यह सुभाषित चार समानान्तर चित्रों से भिन्नता दिखाता है: व्यक्ति-व्यक्ति की मति अलग है, प्रत्येक कुण्ड में नया या ताजा जल है, समुदाय-समुदाय के आचार अलग हैं और मुख-मुख की वाणी नई है। ‘नवं पयः’ का अर्थ नया या ताजा जल है; संस्कृत सीधे उसके स्वाद को भिन्न नहीं कहता। इसलिए साथ दिए अर्थ में अलग स्वाद की बात एक मूर्त व्याख्यात्मक विस्तार है। नवाचार और उद्यम के संदर्भ में इससे विविध प्रतिभाओं, आचारों, भाषाओं और दृष्टियों के सम्मान की प्रेरणा ली जा सकती है, पर सामूहिक शक्ति और रचनात्मकता इस कथन के आधुनिक अनुप्रयोग हैं।

मूल पोस्ट

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सुभाषितरत्नभाण्डागारम् से और सुभाषित

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5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
18 सित॰ 2026
आर्यासप्तशती

स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥

svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।

चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि

विविधता पर और सुभाषित

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8 सित॰ 2026
श्रीमद्भागवत पुराण

अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः। सर्वतः सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पदः॥

aṇubhyaśca mahadbhyaśca śāstrebhyaḥ kuśalo naraḥ । sarvataḥ sāramādadyāt puṣpebhya iva ṣaṭpadaḥ ॥

श्रीमद्भागवत पुराण का श्लोक: कुशल व्यक्ति छोटे-बड़े हर शास्त्र से सार ग्रहण करे, जैसे भ्रमर अनेक पुष्पों से मधु लेता है।

विद्याज्ञानविविधता
13 जुल॰ 2026
मनुस्मृति

कन्यानां सम्प्रदानञ्च कुमाराणाञ्च रक्षणम्। राष्ट्रस्य सङ्ग्रहे नित्यं विधानमिदमाचरेत्॥

kanyānāṃ sampradānañca kumārāṇāñca rakṣaṇam । rāṣṭrasya saṅgrahe nityaṃ vidhānam idam ācaret ॥

मनुस्मृति-आधारित यह शिक्षा कन्याओं के कल्याण, नई पीढ़ी की रक्षा और राष्ट्र की स्थिरता व समृद्धि के लिए सतत प्रबंध को जनप्रतिनिधि का कर्तव्य बताती है।

सुशासनकर्तव्यनारीशक्तिसंस्कृति
29 जून 2026
विदुर नीति

देशाचारान् समयाञ्जातिधर्मान् बुभूषते यस्तु परावरज्ञः। स तत्र तत्राधिगतः सदैव महाजनस्याधिपत्यं करोति॥

deśācārān samayāñ jātidharmān bubhūṣate yastu parāvarajñaḥ । sa tatra tatrādhigataḥ sadaiva mahājanasyādhipatyaṁ karoti ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि स्थानीय आचार, सामाजिक मर्यादाओं और समुदायों की समझ से विश्वास, सम्मान और प्रभाव प्राप्त होता है।

ज्ञानसंस्कृतिसम्मानचरित्र