नारी त्रैलोक्यजननी - नारीशक्ति का दिव्य स्वरूप

12 जून 2026

नारी त्रैलोक्यजननी नारी त्रैलोक्यरूपिणी। नारी त्रिभुवनाधारा नारी शक्तिस्वरूपिणी॥

nārī trailokyajananī nārī trailokyarūpiṇī । nārī tribhuvanādhārā nārī śaktisvarūpiṇī ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

भारत की नारीशक्ति राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है। हमारी माताएं, बहनें और बेटियां आज हर क्षेत्र में अपनी अद्भुत प्रतिभा और कौशल से मां भारती का गौरव बढ़ा रही हैं।

नारी त्रैलोक्यजननी नारी त्रैलोक्यरूपिणी का अर्थ

नारी तीनों लोकों की जननी है। नारी ही तीनों लोकों की अभिव्यक्ति है। वही पूरे संसार का आधार है और वही शक्ति का वास्तविक स्वरूप है।

शब्दार्थ

नारीnārī

नारी

नर

त्रैलोक्यजननीtrailokyajananī

त्रिलोक की जननी

त्रि + लोक + √जन्

त्रैलोक्यरूपिणीtrailokyarūpiṇī

त्रिलोक का स्वरूप

त्रि + लोक + रूप

त्रिभुवनाधाराtribhuvanādhārā

त्रिभुवन का आधार

त्रि + भुवन + आ + √धृ

शक्तिस्वरूपिणीśaktisvarūpiṇī

शक्ति का स्वरूप

शक्ति + स्व + रूप

व्याख्या

यह सुभाषित नारी को केवल किसी सामाजिक भूमिका में नहीं, बल्कि एक विश्वव्यापी शक्ति-तत्त्व के रूप में देखता है। 'त्रैलोक्यजननी', 'त्रैलोक्यरूपिणी' और 'त्रिभुवनाधारा' जैसे पद बताते हैं कि नारी सृष्टि की जननी भी है, उसकी अभिव्यक्ति भी है और उसका आधार भी है। अंतिम पद 'शक्तिस्वरूपिणी' नारी को शक्ति के साक्षात स्वरूप के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जिससे सृजन, संरक्षण, साहस और नवजीवन संभव होते हैं। प्रधानमंत्री के संदेश के संदर्भ में यह श्लोक राष्ट्र-निर्माण में नारीशक्ति की भूमिका को और स्पष्ट करता है। परंपरा में पूजित स्त्री-शक्ति आज माताओं, बहनों और बेटियों की प्रतिभा, नेतृत्व, सेवा और कौशल के रूप में हर क्षेत्र में दिखाई दे रही है।

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नारीशक्ति पर और सुभाषित

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29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

स्वास्थ्यधर्मसमृद्धिआध्यात्मिकता
17 सित॰ 2026
विश्वकर्माष्टकम्

अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥

anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥

विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।

भक्तिआध्यात्मिकता