ते कृषिं च सस्यं च मनुष्या उप जीवन्ति। कृष्टराधिरुपजीवनीयो भवति य एवं वेद॥
te kṛṣiṃ ca sasyaṃ ca manuṣyā upa jīvanti । kṛṣṭarādhir upajīvanīyo bhavati ya evaṃ veda ॥
प्रधानमंत्री का संदेशकृषि केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के पोषण का मूल आधार है। हमारे किसान भाई-बहनों का पसीना जब मिट्टी में मिलता है तो अन्न बनकर देशवासियों के जीवन को संबल देता है।
ते कृषिं च सस्यं का अर्थ
खेती और फसल ही मनुष्य के जीवन का आधार हैं। जो व्यक्ति इस सत्य को समझता है, वही कृषि कार्य को सही ढंग से करता है और उसी के माध्यम से समाज का भरण-पोषण होता है।
शब्दार्थ
- तेte
वे
तद्
- कृषिम्kṛṣim
कृषि
√कृष्
- च सस्यम्ca sasyam
और अन्न
सस्य
- च मनुष्याःca manuṣyāḥ
और मनुष्य
मनु
- उप जीवन्तिupa jīvanti
आश्रित रहते हैं
उप + √जीव्
- कृष्टराधिःkṛṣṭarādhiḥ
कृषि से समृद्ध
√कृष् + √राध्
- उपजीवनीयःupajīvanīyaḥ
जिसके सहारे जिया जाए
उप + √जीव्
- भवतिbhavati
होता है
√भू
- यः एवम् वेदya evaṁ veda
जो ऐसा जानता है
√विद्
व्याख्या
यह मंत्र बहुत सरल शब्दों में एक गहरी बात कहता है कि मनुष्य कृषि और फसल के सहारे ही जीवन चलाता है। 'कृषि' खेती के श्रम को बताती है और 'सस्य' उस श्रम से प्राप्त अन्न और फसल को; दोनों मिलकर समाज के पोषण का आधार बनते हैं। यहाँ अन्न को केवल वस्तु या उपज नहीं, बल्कि धरती, ऋतु, श्रम और अनुशासन से जुड़ी जीवन-व्यवस्था के रूप में देखा गया है। 'य एवं वेद' यानी जो इस सत्य को जानता है, वह कृषि के महत्व को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं देखता। उसके लिए खेती समाज को जीवित रखने वाला कर्तव्य बन जाती है। प्रधानमंत्री के संदेश के संदर्भ में यह मंत्र किसान के परिश्रम का सम्मान करता है: मिट्टी में मिला हुआ पसीना अन्न बनता है, और वही अन्न देशवासियों को शक्ति, स्थिरता और पोषण देता है।
मूल पोस्ट
अथर्ववेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥
sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।
कृषि पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।