वनस्पते शतवल्शो वि रोह सहस्रवल्शा वि वयं रुहेम। यं त्वामयं स्वधितिस्तेजमानः प्रणिनाय महते सौभगाय॥
vanaspate śatavalśo vi roha sahasravalśā vi vayaṁ ruhema । yaṁ tvāmayaṁ svadhitistejamānaḥ praṇināya mahate saubhagāya ॥
वनस्पते शतवल्शो वि रोह का अर्थ
हे वनस्पति! तुम सैकड़ों और हजारों शाखाओं के साथ विकसित और समृद्ध बनो, और हम भी तुम्हारे साथ उन्नति करें। जिस तेजस्वी शक्ति ने तुम्हें महान कल्याण और समृद्धि के लिए विकसित किया है, वही हम सबके लिए भी मंगलकारी हो।
शब्दार्थ
- वनस्पतेvanaspate
हे वनस्पति
वन + पति
- शतवल्शःśatavalśaḥ
सौ शाखाओं वाले
शत + वल्श
- वि रोहvi roha
बढ़ो
वि + √रुह्
- सहस्रवल्शाःsahasravalśāḥ
सहस्र शाखाओं वाले
सहस्र + वल्श
- वि वयम् रुहेमvi vayaṁ ruhema
हम बढ़ें
वि + √रुह्
- यम् त्वाम्yaṁ tvām
जिस तुमको
- अयम् स्वधितिःayaṁ svadhitiḥ
यह कुल्हाड़ी
स्वधिति
- तेजमानःtejamānaḥ
तीक्ष्ण होती हुई
√तिज्
- प्रणिनायpraṇināya
ले आई है
प्र + नि + √नी
- महते सौभगायmahate saubhagāya
महान् सौभाग्य के लिए
सु + भग
व्याख्या
मन्त्र वनस्पति को सौ शाखाओं के साथ बढ़ने के लिए सम्बोधित करता है, जबकि वक्ता अपने लिए सहस्र शाखाओं के साथ बढ़ने की कामना करते हैं। किन्तु दूसरा अर्ध किसी पोषक तेजस्वी शक्ति का वर्णन नहीं करता। 'स्वधितिः' कुल्हाड़ी है और 'तेजमानः' उसके तीक्ष्ण किए जाने को बताता है: यह तीक्ष्ण कुल्हाड़ी वनस्पति को महान् सौभाग्य के लिए आगे लाई है। संग्रहीत अर्थ साथ-साथ विकास के बिम्ब को रखता है, पर इस अनुष्ठानिक कर्तन को पर्यावरणीय रचनात्मक शक्ति से बदल देता है। सतत विकास पहले अर्ध से निकलने वाला आधुनिक अनुप्रयोग है, न कि दूसरे अर्ध का शाब्दिक अर्थ।
मूल पोस्ट
ऋग्वेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।
शं नो वातः पवतां शं नस्तपतु सूर्यः। शं नः कनिक्रदद् देवः पर्जन्योऽभिवर्षतु॥
śaṃ no vātaḥ pavatāṃ śaṃ nas tapatu sūryaḥ । śaṃ naḥ kanikradad devaḥ parjanyo 'bhivarṣatu ॥
शुक्ल यजुर्वेद का यह मन्त्र वायु, सूर्य और वर्षा के देवता पर्जन्य से कल्याणकारी होने की प्रार्थना करता है।
प्रकृति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंहिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥
hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥
चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।