देशाचारान् समयाञ् - संस्कृतियों का विवेक

29 जून 2026

देशाचारान् समयाञ्जातिधर्मान् बुभूषते यस्तु परावरज्ञः। स तत्र तत्राधिगतः सदैव महाजनस्याधिपत्यं करोति॥

deśācārān samayāñ jātidharmān bubhūṣate yastu parāvarajñaḥ । sa tatra tatrādhigataḥ sadaiva mahājanasyādhipatyaṁ karoti ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों का सम्मान करने से लोगों के बीच विश्वास और सहयोग की भावना बढ़ती है। इससे आपसी समझ और भाईचारा और मजबूत होता है।

देशाचारान् समयाञ्जातिधर्मान् बुभूषते यस्तु का अर्थ

विभिन्न संस्कृतियों, परंपराओं और सामाजिक नियमों को समझने वाले व्यक्ति में उचित-अनुचित का विवेक विकसित हो जाता है। ऐसा व्यक्ति जहाँ भी जाता है, वहाँ सम्मान प्राप्त करता है और श्रेष्ठजनों के बीच अपना प्रभाव स्थापित करता है।

शब्दार्थ

देशाचारान्deśācārān

देशों के आचार

देश + आ + √चर्

समयान्samayān

परम्पराएँ

सम् + √इ

जातिधर्मान्jātidharmān

जातियों के धर्म

जाति + धर्म

बुभूषतेbubhūṣate

स्वयं को उनके अनुरूप ढालना चाहता है

√भू

यः तुyas tu

जो

यद्

परावरज्ञःparāvarajñaḥ

श्रेष्ठ और निम्न को जानने वाला

पर + अवर + √ज्ञा

सःsaḥ

वह

तद्

तत्र तत्रtatra tatra

वहाँ-वहाँ

अधिगतःadhigataḥ

पहुँचकर

अधि + √गम्

सदा एवsadaiva

सदा ही

महाजनस्यmahājanasya

महाजन का

महा + जन

आधिपत्यम्ādhipatyam

आधिपत्य

अधि + पति

करोतिkaroti

करता है

√कृ

व्याख्या

विदुर नीति का यह श्लोक बुद्धिमान व्यक्ति को 'परावरज्ञ' कहता है, अर्थात् जो बड़े सिद्धांतों के साथ-साथ व्यवहार की सूक्ष्मताओं को भी समझता है। यहाँ 'देशाचार' स्थानीय आचार-व्यवहार, 'समय' सामाजिक मान्यता या परंपरा, और 'जातिधर्म' अलग-अलग समुदायों से जुड़ी मर्यादाओं की ओर संकेत करता है। श्लोक का संदेश अंधानुकरण नहीं, बल्कि सजग संवेदनशीलता है: जो व्यक्ति समाजों की विविध जीवन-पद्धतियों को समझता है, वह अहंकार के बजाय विवेक से व्यवहार करता है। इसी समझ से विश्वास और सम्मान पैदा होता है। ऐसा व्यक्ति जहाँ भी जाता है, वहाँ लोगों के बीच सहज रूप से स्वीकार किया जाता है, क्योंकि वह भिन्नता को बाधा नहीं, संवाद का आधार मानता है। प्रधानमंत्री मोदी के संदेश में यही शिक्षा आधुनिक संदर्भ में सामने आती है कि विविध संस्कृतियों का सम्मान सहयोग, आपसी समझ और भाईचारे को मजबूत करता है।

मूल पोस्ट

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विदुर नीति से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

ज्ञान पर और सुभाषित

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9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस