शीलवान् पूजितो लोके शीलवान् साधुसम्मतः। शीलवान् सर्वकर्मार्हः शीलवान् प्रियदर्शनः॥
śīlavān pūjito loke śīlavān sādhusammataḥ । śīlavān sarvakarmārhaḥ śīlavān priyadarśanaḥ ॥
शीलवान् पूजितो लोके शीलवान् का अर्थ
सदाचारी मनुष्य समाज में प्रतिष्ठा और सज्जनों का आदर प्राप्त करता है। उत्तम चरित्र से युक्त व्यक्ति अपने सत्यनिष्ठ, विनम्र और मर्यादित आचरण के कारण प्रत्येक उत्तरदायित्व के योग्य माना जाता है, उसका व्यक्तित्व सभी के लिए आकर्षक और अनुकरणीय होता है। वास्तव में, सफलता, प्रभावी नेतृत्व और अटूट विश्वास का वास्तविक आधार उत्तम चरित्र ही है।
शब्दार्थ
- शीलवान्śīlavān
शीलवान्
शील
- पूजितःpūjitaḥ
पूजित होता है
√पूज्
- लोकेloke
संसार में
लोक
- साधुसम्मतःsādhusammataḥ
सज्जनों से सम्मत
√साध् + सम् + √मन्
- सर्वकर्मार्हःsarvakarmārhaḥ
सब कार्यों के योग्य
सर्व + √कृ + √अर्ह्
- प्रियदर्शनःpriyadarśanaḥ
प्रियदर्शन
प्रिय + √दृश्
व्याख्या
यह श्लोक अपने चारों कथनों को ‘शीलवान्’, अर्थात उत्तम चरित्र और स्थिर सदाचार से युक्त व्यक्ति, के आसपास रचता है। ऐसा व्यक्ति समाज में ‘पूजितः’ यानी सम्मानित होता है और ‘साधुसम्मतः’ अर्थात सज्जनों की स्वीकृति तथा आदर प्राप्त करता है। ‘सर्वकर्मार्हः’ इसका व्यावहारिक परिणाम बताता है: अच्छे चरित्र वाला व्यक्ति हर प्रकार का उत्तरदायित्व सौंपे जाने योग्य माना जाता है, जबकि ‘प्रियदर्शनः’ उसके प्रिय और स्वीकार्य व्यक्तित्व की ओर संकेत करता है। स्थपति के लक्षणों का वर्णन करने वाले मूल अध्याय में यह सूक्ति तकनीकी दक्षता के साथ चरित्र को अनिवार्य रखती है। जब योग्यता विश्वसनीय आचरण से जुड़ती है, तभी स्थायी भरोसा और सामाजिक सम्मान उत्पन्न होते हैं। इसलिए यहाँ शील केवल निजी गुण नहीं, बल्कि सम्मान और उत्तरदायित्व का आधार है।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
समराङ्गणसूत्रधार से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
चरित्र पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।